भारतीय सनातन परंपरा में “धर्म” शब्द का अर्थ अत्यंत व्यापक और गहन है। यह केवल मंदिर में जाकर पूजा करना, मंत्रोच्चार करना या विशेष अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। धर्म वह आचरण है जो जीवन को सत्य, करुणा, संयम, कर्तव्य और लोकमंगल की दिशा में अग्रसर करे। धर्म वह शक्ति है जो व्यक्ति को अपने स्वार्थ से ऊपर उठाकर समाज और सृष्टि के कल्याण के लिए प्रेरित करती है।
इसी व्यापक भावना को एक सरल लेकिन अत्यंत प्रभावशाली वाक्य में व्यक्त किया गया है,
“सेवा ही धर्म है।”
सनातन दृष्टिकोण के अनुसार सेवा केवल दान देने या सहायता करने का कार्य नहीं है, बल्कि यह आत्मिक साधना है। जब व्यक्ति निःस्वार्थ भाव से किसी जरूरतमंद की सहायता करता है, पीड़ित के आँसू पोंछता है, प्रकृति की रक्षा करता है या समाज के उत्थान के लिए प्रयास करता है, तब वह वास्तव में धर्म का पालन कर रहा होता है।
सेवा का आध्यात्मिक आयाम (Spiritual Dimension of Service)
सनातन परंपरा में सेवा को आत्मा की शुद्धि का माध्यम माना गया है। निःस्वार्थ सेवा से अहंकार कम होता है, मन में विनम्रता आती है और हृदय में करुणा का विकास होता है। गीता का कर्मयोग भी यही सिखाता है कि बिना फल की इच्छा के किया गया कर्म ही श्रेष्ठ है। सेवा व्यक्ति को भीतर से पवित्र और संतुलित बनाती है।
सेवा का सामाजिक आयाम (Social Dimension of Service)
सेवा समाज की उन्नति का आधार है। जब समाज के लोग परस्पर सहयोग, दया और समर्पण की भावना से कार्य करते हैं, तो सामाजिक विषमताएँ कम होती हैं और एकता मजबूत होती है। अनाथों, वृद्धों, बीमारों, पशु-पक्षियों और पर्यावरण की सेवा समाज को संवेदनशील और सशक्त बनाती है। आप इस दिशा में भाग लेने के लिए सनातन सेवाएं देख सकते हैं।”
संघ द्वारा संचालित विभिन्न सनातन अभियान समाज में सकारात्मक परिवर्तन के लिए निरंतर कार्य कर रहे हैं।
सेवा: आत्मोन्नति और लोकमंगल का संगम (Service: Self-Improvement and Public Welfare)
सनातन दृष्टि में सेवा दो स्तरों पर कार्य करती है,
आत्मिक उन्नति – यह व्यक्ति के भीतर सद्गुणों का विकास करती है।
सामाजिक उत्थान – यह समाज को अधिक न्यायपूर्ण, समरस और मानवीय बनाती है।
इस प्रकार सेवा केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पवित्र शैली है। जब व्यक्ति “मैं” से ऊपर उठकर “हम” की भावना अपनाता है, तब ही सच्चे अर्थों में धर्म जीवंत होता है।
अतः सनातन परंपरा हमें सिखाती है कि धर्म का वास्तविक स्वरूप मंदिरों की दीवारों से आगे बढ़कर मानवता की सेवा में प्रकट होता है। सेवा ही वह सेतु है जो व्यक्ति को ईश्वर से और समाज को समरसता से जोड़ता है।
आप अधिक जानकारी के लिए सनातन धर्म का इतिहास और सनातन धर्म के सिद्धांत भी पढ़ सकते हैं।
सेवा का आध्यात्मिक अर्थ (Spiritual Significance of Service)
सनातन धर्म में सेवा का स्थान (Place of Service in Sanatan Dharma)
सनातन धर्म में सेवा को केवल सामाजिक दायित्व नहीं, बल्कि ईश्वर-साधना का एक श्रेष्ठ मार्ग माना गया है। यहाँ पूजा, जप, तप और ध्यान जितने महत्वपूर्ण हैं, उतनी ही महत्वपूर्ण निःस्वार्थ सेवा भी है। जब मनुष्य अपने स्वार्थ, अहंकार और व्यक्तिगत लाभ से ऊपर उठकर किसी अन्य प्राणी के दुःख को कम करने का प्रयास करता है, तब वह वास्तव में ईश्वर के समीप पहुँचता है।
सनातन विचारधारा यह सिखाती है कि ईश्वर केवल मंदिरों या मूर्तियों में सीमित नहीं हैं, बल्कि वे प्रत्येक जीव में विद्यमान हैं। इसलिए जब कोई व्यक्ति भूखे को अन्न देता है, रोगी की सेवा करता है, असहाय का सहारा बनता है या प्रकृति की रक्षा करता है, तब वह प्रत्यक्ष रूप से ईश्वर की ही आराधना कर रहा होता है। इस दृष्टि से सेवा, भक्ति का साकार रूप है।
“सेवा ही धर्म है” की अवधारणा (Concept of “Service is Dharma”)
“सेवा ही धर्म है” केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक गहन आध्यात्मिक दृष्टि है। यह अवधारणा हमें सिखाती है कि—
- प्रत्येक जीव में परमात्मा का वास है।
- किसी भी प्राणी की सहायता करना, वास्तव में ईश्वर की सेवा करना है।
- मानवता की सेवा ही सच्ची धार्मिकता है।
जब हम किसी की सहायता करते हैं, तो हम केवल एक व्यक्ति की मदद नहीं करते, बल्कि उस परम चेतना का सम्मान करते हैं जो उसमें विद्यमान है। यही भावना समाज में करुणा, समानता और आत्मीयता को जन्म देती है।
आप धर्म जागरूकता के महत्व को और समझने के लिए धर्म जागरूकता अर्थ और धर्म जागरूकता के फायदे पढ़ सकते हैं।
निःस्वार्थ कर्म का सिद्धांत (Principle of Selfless Action)
सेवा तभी धर्म बनती है जब उसमें किसी प्रकार का अहंकार, दिखावा या लाभ की इच्छा न हो। यदि सेवा के पीछे प्रसिद्धि, प्रशंसा या प्रतिफल की कामना हो, तो उसका आध्यात्मिक मूल्य कम हो जाता है।
निःस्वार्थ सेवा का अर्थ है,
- बिना किसी अपेक्षा के कार्य करना।
- दूसरों की सहायता को अपना कर्तव्य मानना।
- सेवा को उपकार नहीं, बल्कि अवसर समझना।
ऐसी सेवा मन को शुद्ध करती है और आत्मा को हल्का व शांत बनाती है। यह व्यक्ति के भीतर विनम्रता और कृतज्ञता का भाव विकसित करती है।
कर्मयोग का महत्व (Importance of Karma Yoga)
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने कर्मयोग को जीवन का सर्वोच्च मार्ग बताया है। उन्होंने अर्जुन को उपदेश दिया,
“कर्म करो, फल की चिंता त्यागो।”
कर्मयोग का सार यही है कि मनुष्य अपने कर्तव्यों का पालन पूर्ण निष्ठा और समर्पण से करे, लेकिन उसके परिणाम से स्वयं को आसक्त न करे। जब सेवा इस भावना से की जाती है, तब वह साधारण कर्म नहीं रह जाती, बल्कि योग बन जाती है—आत्मा और परमात्मा के मिलन का माध्यम।
कर्मयोग हमें सिखाता है कि सेवा कोई अलग कार्य नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा होना चाहिए। परिवार, समाज, राष्ट्र और समस्त सृष्टि के प्रति कर्तव्य निभाना ही सच्चा धर्म है।
सनातन ग्रंथों में समाज सेवा (Social Service in Sanatan Scriptures)
सनातन परंपरा के मूल ग्रंथ, वेद, उपनिषद और भगवद्गीता केवल आध्यात्मिक ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि समाज के कल्याण और मानवता की सेवा का स्पष्ट मार्ग भी दिखाते हैं। इन ग्रंथों में धर्म का अर्थ व्यक्तिगत मुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि लोकमंगल, सर्वभूत हित और निष्काम कर्म के माध्यम से समाज की उन्नति भी है।
वेद, उपनिषद और गीता में सेवा की भावना (Service in Vedas, Upanishads, and Gita)
वेदों में लोककल्याण की भावना
वेद सनातन ज्ञान के आदि स्रोत हैं। वेदों में बार-बार “सर्वे भवन्तु सुखिनः” जैसी भावना व्यक्त होती है, जो समस्त प्राणियों के सुख और कल्याण की कामना करती है। वेद हमें सिखाते हैं कि मानव जीवन केवल व्यक्तिगत सुख के लिए नहीं, बल्कि समाज और विश्व के हित के लिए है।
यज्ञ की अवधारणा भी इसी लोककल्याण से जुड़ी है। यज्ञ का वास्तविक अर्थ केवल अग्निहोत्र नहीं, बल्कि त्याग और सहयोग की भावना है, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति अपने हिस्से का योगदान देकर सामूहिक कल्याण सुनिश्चित करता है। यह विचार समाज सेवा की मूल प्रेरणा है।
उपनिषदों में सर्वभूत हित का विचार
उपनिषद आत्मा और ब्रह्म के एकत्व की शिक्षा देते हैं। जब यह समझ विकसित होती है कि समस्त सृष्टि में एक ही चेतना व्याप्त है, तब दूसरों की सेवा करना अपने ही विस्तार की सेवा बन जाता है।
उपनिषदों का संदेश है कि जो व्यक्ति सभी प्राणियों में अपने आत्मस्वरूप को देखता है, वह किसी से द्वेष नहीं करता। इस दृष्टि से सेवा केवल सामाजिक कर्तव्य नहीं, बल्कि आध्यात्मिक अनुभूति का स्वाभाविक परिणाम है।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना भी इसी विचार से उत्पन्न होती है, संपूर्ण विश्व एक परिवार है। जब विश्व परिवार है, तो सेवा उसका स्वाभाविक धर्म बन जाता है।
गीता में निष्काम कर्म और सेवा का संदेश
भगवद्गीता समाज सेवा को कर्मयोग के रूप में प्रस्तुत करती है। श्रीकृष्ण अर्जुन को सिखाते हैं कि अपने कर्तव्य का पालन बिना फल की इच्छा के करना ही श्रेष्ठ मार्ग है।
निष्काम कर्म का अर्थ है,
- कर्म करते समय अहंकार और आसक्ति का त्याग
- परिणाम की चिंता किए बिना कर्तव्य का पालन
- सेवा को ईश्वरार्पण भाव से करना
गीता स्पष्ट करती है कि जो व्यक्ति अपने कर्म को समाज और ईश्वर को समर्पित करता है, वह बंधन से मुक्त होता है। इस प्रकार सेवा केवल सामाजिक कार्य नहीं, बल्कि मुक्ति का मार्ग भी बन जाती है।
समाज सेवा के प्रमुख क्षेत्र (Major Areas of Social Service)
समाज सेवा केवल दान देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह समाज के विभिन्न आयामों में सकारात्मक परिवर्तन लाने का एक समर्पित प्रयास है। सनातन दृष्टिकोण में सेवा का उद्देश्य व्यक्ति, समाज और प्रकृति—तीनों का संतुलित विकास है। समाज सेवा के कुछ प्रमुख क्षेत्र निम्नलिखित हैं:
1. शिक्षा सेवा
ज्ञान का दान सनातन परंपरा में सर्वोच्च दान माना गया है। क्योंकि धन, वस्त्र या भोजन अस्थायी सहायता दे सकते हैं, लेकिन शिक्षा व्यक्ति को आत्मनिर्भर बनाती है और जीवनभर उसका मार्गदर्शन करती है।
शिक्षा सेवा के अंतर्गत,
- निर्धन बच्चों को निःशुल्क शिक्षा प्रदान करना
- पुस्तक, वर्दी और अध्ययन सामग्री की व्यवस्था करना
- गुरुकुल, विद्यालय और संस्कार केंद्र स्थापित करना
- नैतिक और सांस्कृतिक शिक्षा का प्रसार करना
वैदिक शिक्षा समाज को जागरूक, सक्षम और आत्मनिर्भर बनाती है। जब समाज शिक्षित होता है, तब वह अंधविश्वास, शोषण और असमानता से मुक्त होकर प्रगति की ओर अग्रसर होता है। इसलिए शिक्षा सेवा केवल व्यक्तिगत विकास नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का आधार है।
2. स्वास्थ्य सेवा
स्वास्थ्य मानव जीवन का मूल आधार है। यदि शरीर स्वस्थ नहीं है, तो व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन भी नहीं कर सकता। इसलिए रोगियों की सेवा, चिकित्सा सहायता और स्वास्थ्य जागरूकता को अत्यंत महत्वपूर्ण समाज सेवा माना गया है।
स्वास्थ्य सेवा के प्रमुख कार्य,
- निःशुल्क चिकित्सा शिविरों का आयोजन
- रक्तदान और अंगदान अभियान
- गरीबों के लिए दवाइयों की व्यवस्था
- स्वच्छता और स्वास्थ्य जागरूकता कार्यक्रम
यह सेवा न केवल जीवन की रक्षा करती है, बल्कि समाज में करुणा और सहानुभूति की भावना को भी सुदृढ़ करती है। किसी रोगी की पीड़ा कम करना वास्तव में मानवता की सेवा है।
3. पर्यावरण संरक्षण
सनातन संस्कृति में प्रकृति को माता का स्थान दिया गया है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश, इन पंचमहाभूतों की रक्षा करना धर्म का अंग माना गया है।
पर्यावरण सेवा के अंतर्गत,
- वृक्षारोपण और जल संरक्षण अभियान
- नदियों और जलस्रोतों की स्वच्छता
- प्लास्टिक मुक्त अभियान
- पशु-पक्षियों की रक्षा
प्रकृति की सेवा वास्तव में भविष्य की पीढ़ियों की सेवा है। यदि हम पर्यावरण की रक्षा करते हैं, तो हम आने वाले समय के लिए स्वस्थ और संतुलित जीवन सुनिश्चित करते हैं। यह सेवा केवल वर्तमान के लिए नहीं, बल्कि आने वाले युगों के लिए भी है।
4. गरीब और वंचित वर्ग की सहायता
समाज में ऐसे अनेक लोग हैं जो आर्थिक, सामाजिक या शारीरिक रूप से कमजोर हैं। उनकी सहायता करना सच्ची समाज सेवा है।
इस सेवा के अंतर्गत,
- भूखों को भोजन उपलब्ध कराना
- जरूरतमंदों को वस्त्र और आश्रय देना
- अनाथ, वृद्ध और दिव्यांग जनों की सहायता
- सम्मान और आत्मविश्वास प्रदान करना
केवल भौतिक सहायता ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि उनके आत्मसम्मान की रक्षा करना भी आवश्यक है। जब हम किसी जरूरतमंद को सम्मानपूर्वक सहायता देते हैं, तब हम उसके भीतर आशा और विश्वास का संचार करते हैं।
सेवा से आत्मिक और सामाजिक लाभ (Spiritual and Social Benefits of Service)
आत्मसंतोष
सेवा से मिलने वाला संतोष भौतिक सुखों से कहीं अधिक स्थायी होता है।
सामाजिक समरसता
सेवा जाति, वर्ग और भेदभाव की दीवारें तोड़ती है।
युवा वर्ग और समाज सेवा (Youth and Social Service)
किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसका युवा वर्ग होता है। युवाओं में ऊर्जा, उत्साह, नवीन सोच और परिवर्तन की अपार क्षमता होती है। यदि इस शक्ति को सही दिशा मिले, तो वह समाज और राष्ट्र के विकास में निर्णायक भूमिका निभा सकती है। समाज सेवा युवाओं को यही सकारात्मक दिशा प्रदान करती है।
स्वयंसेवा की भूमिका
स्वयंसेवा (Volunteering) वह माध्यम है जिसके द्वारा युवा बिना किसी व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा के समाज के लिए कार्य करते हैं। यह केवल सेवा का कार्य नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण की एक सशक्त प्रक्रिया है।
युवा वर्ग में स्वाभाविक रूप से उत्साह और कर्मशीलता होती है। यदि यह ऊर्जा केवल व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं तक सीमित रह जाए, तो उसका प्रभाव सीमित हो जाता है। लेकिन जब वही ऊर्जा समाज सेवा में लगती है, तो वह व्यापक परिवर्तन का कारण बनती है।
स्वयंसेवा के माध्यम से युवा,
- समाज की वास्तविक समस्याओं को समझते हैं
- विविध वर्गों के लोगों से जुड़ते हैं
- संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनते हैं
यह प्रक्रिया उन्हें केवल दर्शक नहीं, बल्कि सक्रिय सहभागी बनाती है। सेवा का अनुभव उन्हें यह सिखाता है कि परिवर्तन बाहर से नहीं, भीतर से प्रारंभ होता है।
सेवा से नेतृत्व विकास (Leadership Development through Service)
समाज सेवा केवल सहयोग करना नहीं सिखाती, बल्कि नेतृत्व की क्षमता भी विकसित करती है। जब युवा किसी अभियान, आयोजन या सामाजिक कार्यक्रम का हिस्सा बनते हैं, तो वे स्वाभाविक रूप से कई महत्वपूर्ण गुण सीखते हैं।
जिम्मेदारी की भावना
सेवा करते-करते युवा समझते हैं कि प्रत्येक कार्य का प्रभाव समाज पर पड़ता है। समय पर कार्य पूरा करना, टीम के साथ समन्वय बनाना और कठिन परिस्थितियों में धैर्य रखना, ये सभी गुण उनमें जिम्मेदारी की भावना को मजबूत करते हैं।
करुणा और संवेदनशीलता
जब युवा सीधे तौर पर जरूरतमंदों, गरीबों, रोगियों या पर्यावरण से जुड़ी समस्याओं को देखते हैं, तो उनके भीतर करुणा और सहानुभूति का विकास होता है। यह संवेदनशीलता उन्हें बेहतर इंसान बनाती है और निर्णय लेने में मानवीय दृष्टिकोण प्रदान करती है।
नेतृत्व और संगठन क्षमता
सेवा कार्यों के दौरान युवाओं को टीम बनाना, कार्य विभाजन करना, समस्याओं का समाधान निकालना और लक्ष्य तक पहुँचना सीखने का अवसर मिलता है। यही अनुभव भविष्य में उन्हें प्रभावी नेता बनाता है।
सच्चा नेतृत्व वही है जो सेवा से उत्पन्न होता है, जहाँ नेता स्वयं आगे बढ़कर कार्य करता है और दूसरों को प्रेरित करता है।
आधुनिक समाज में सेवा की आवश्यकता (Need for Service in Modern Society)
समय के साथ समाज ने अभूतपूर्व प्रगति की है, विज्ञान, तकनीक, संचार और जीवन सुविधाओं में निरंतर विस्तार हुआ है। फिर भी आधुनिक समाज अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। आर्थिक विषमता, सामाजिक दूरी, प्रतिस्पर्धा की मानसिकता और नैतिक मूल्यों में गिरावट जैसी समस्याएँ आज व्यापक रूप से दिखाई देती हैं। ऐसे परिवेश में सेवा की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है।
सामाजिक असमानता
आधुनिक युग में एक ओर संपन्नता और संसाधनों की प्रचुरता है, तो दूसरी ओर गरीबी, बेरोजगारी और अवसरों की कमी भी मौजूद है। आर्थिक और सामाजिक विषमता के कारण समाज के एक बड़े वर्ग को मूलभूत सुविधाओं—शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन और सम्मान, से वंचित रहना पड़ता है।
ऐसी स्थिति में सेवा एक सेतु का कार्य करती है।
- यह संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण की भावना को मजबूत करती है।
- सक्षम वर्ग को समाज के कमजोर वर्ग के प्रति उत्तरदायी बनाती है।
- सामाजिक दूरी को कम कर आपसी सहयोग और सहानुभूति को बढ़ाती है।
जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार योगदान देता है, तो असमानता की खाई धीरे-धीरे कम होने लगती है। सेवा केवल सहायता नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन की पुनर्स्थापना का माध्यम बन जाती है।
नैतिक मूल्यों की कमी (Lack of Moral Values)
भौतिक प्रगति के साथ-साथ कई बार नैतिक मूल्यों में कमी भी देखने को मिलती है। प्रतिस्पर्धा, स्वार्थ और व्यक्तिगत लाभ की प्रवृत्ति समाज में संवेदनशीलता को कम कर सकती है। परिणामस्वरूप विश्वास, सहयोग और पारस्परिक सम्मान जैसे मूलभूत सामाजिक मूल्य कमजोर पड़ने लगते हैं।
सेवा इन मूल्यों को पुनर्जीवित करने का प्रभावी माध्यम है।
- सेवा से करुणा और सहानुभूति का विकास होता है।
- यह व्यक्ति को दूसरों के दुख-दर्द को समझने की प्रेरणा देती है।
- समाज में विश्वास और आत्मीयता की भावना को मजबूत करती है।
जब लोग निःस्वार्थ भाव से एक-दूसरे की सहायता करते हैं, तो सामाजिक संबंध अधिक सुदृढ़ और मानवीय बनते हैं। सेवा व्यक्ति को केवल दाता नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और नैतिक नागरिक बनाती है।
निष्कर्ष (Conclusion)
सनातन धर्म का सार यही है कि धर्म वही है जो समाज का कल्याण करे। सेवा के माध्यम से ही सच्चे अर्थों में धर्म की स्थापना होती है। जब प्रत्येक व्यक्ति सेवा को अपना कर्तव्य मान ले, तभी एक सशक्त, समरस और संस्कारवान समाज का निर्माण संभव है।
यदि आप “सेवा ही धर्म है” की इस पवित्र भावना को अपने जीवन में उतारना चाहते हैं और समाज में सकारात्मक परिवर्तन का भाग बनना चाहते हैं, तो सनातन संस्कृतिक संघ द्वारा संचालित विभिन्न सेवा एवं जागरूकता अभियानों से जुड़ सकते हैं। आप सेवा कार्यों में सक्रिय भागीदारी के लिए सदस्यता ग्रहण कर सकते हैं, धर्म और समाज सेवा के कार्यों को सशक्त बनाने हेतु दान के माध्यम से सहयोग कर सकते हैं, अथवा किसी भी प्रकार की जानकारी और सहभागिता के लिए संपर्क कर सकते हैं। आपका छोटा सा योगदान भी धर्म, समाज और संस्कृति के उत्थान में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
Q1. सेवा को धर्म क्यों कहा गया है?
क्योंकि निःस्वार्थ सेवा मानवता और ईश्वर, दोनों की सेवा मानी जाती है।
Q2. क्या समाज सेवा आध्यात्मिक विकास में सहायक है?
हाँ, सेवा से अहंकार कम होता है और आत्मिक उन्नति होती है।
Q3. क्या सेवा केवल आर्थिक दान तक सीमित है?
नहीं। सेवा केवल धन देने तक सीमित नहीं है। समय देना, ज्ञान साझा करना, श्रमदान करना, पर्यावरण संरक्षण या जरूरतमंदों की मदद करना भी सेवा है। सच्ची सेवा निःस्वार्थ भाव से की जाती है।
Q4. क्या सामान्य व्यक्ति भी समाज सेवा में योगदान दे सकता है?
हाँ। प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार सेवा कर सकता है। छोटे-छोटे काम जैसे किसी की मदद करना, शिक्षा या स्वच्छता में योगदान भी समाज सेवा हैं।
Q5. सेवा करते समय कौन-सी भावना सबसे महत्वपूर्ण है?
निःस्वार्थ भाव, विनम्रता और कर्तव्यनिष्ठा। अहंकार, दिखावा या प्रतिफल की अपेक्षा से सेवा का आध्यात्मिक प्रभाव कम हो जाता है।





