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बकरा ईद पर सनातन दृष्टिकोण और जीव रक्षा का पुनीत प्रयास

भूमिका

भारत विविध धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का देश है। यहाँ प्रत्येक पर्व और उत्सव का मूल उद्देश्य आनंद, आत्मिक उत्थान और समाज में सद्भाव फैलाना होता है। परंतु जब किसी पर्व के नाम पर निर्दोष जीवों की हिंसा की जाती है, तो वह केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं रह जाती, बल्कि वह मानवता के विरुद्ध एक अमानवीय कृत्य बन जाती है।

बकरा ईद एक ऐसा अवसर है, जब अनेक स्थानों पर बकरों सहित अन्य अबोल जीवों को काटने की परंपरा के नाम पर दर्दनाक स्थिति से गुजरना पड़ता है। भारत जैसे करुणा और अहिंसा प्रधान देश में निर्धवंश परिणाम यह दृश्य केवल सनातन धर्म ही नहीं, बल्कि संपूर्ण संवेदनशील मानवता के लिए पीड़ादायक है।

सनातन धर्म का दृष्टिकोण

सनातन धर्म का मूल आधार है “अहिंसा परमो धर्मः”।
हमारे शास्त्रों, उपनिषदों, संतों और ऋषियों ने सदैव यह सिखाया है कि हर जीव में परमात्मा का वास होता है। जब हम किसी निर्दोष प्राणी को पीड़ा पहुँचाते हैं, तो वह केवल एक शरीर की हत्या नहीं होती, बल्कि वह हमारे धर्म, चेतना और करुणा की भी हत्या होती है।

वेद, उपनिषद और जैन, बौद्ध, सिख जैसे मोक्षमार्गी धर्म सभी एकमत से कहते हैं कि हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकती, चाहे वह किसी भी रीति-रिवाज या पर्व के नाम पर क्यों न हो।

सनातन सांस्कृतिक संघ का प्रयास

इस वर्ष बकरीद के अवसर पर सनातन सांस्कृतिक संघ को जानकारी मिली कि कुछ लोगों द्वारा अनेक बकरों को अवैध, असंवैधानिक और अमानवीय तरीकों से काटने के लिए ले जाया जा रहा था। यह कार्य न केवल कानून के विरुद्ध था, बल्कि सनातन धर्म की मूल भावना के भी खिलाफ था

संघ के कार्यकर्ताओं ने तत्काल सक्रिय होकर बीच रास्ते में इन निर्दोष जीवों को बचाया और उन्हें जैन पांजरा पोलमें सुरक्षित स्थान पर आश्रय दिलवाया, जहाँ इन जीवों की सेवा, देखभाल और रक्षा की जा रही है।

यह केवल जीव रक्षा नहीं, एक आध्यात्मिक आंदोलन है

सनातन सांस्कृतिक संघ का यह कार्य केवल कुछ जीवों को बचाना नहीं है, बल्कि यह एक वैचारिक और आध्यात्मिक जागरण का प्रतीक है। यह संदेश देता है कि सच्चा बलिदान दूसरों की बलि देना नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ, क्रोध और हिंसा की प्रवृत्तियों का त्याग करना है।

धर्म केवल कर्मकांड नहीं है, धर्म वह है जो करुणा, दया और प्रेम से जीवन को ऊंचा उठाए।
इसलिए हमें यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या कोई ऐसा पर्व या परंपरा जो निर्दोषों की पीड़ा पर आधारित हो, वास्तव में धार्मिक हो सकती है?

निष्कर्ष

आज आवश्यकता है कि हम धर्म और परंपरा को पुनः उसके मूल रूप में समझें।
पर्वों को हर्ष और करुणा का माध्यम बनाएं, न कि रक्त और पीड़ा का।
सनातन सांस्कृतिक संघ का यह प्रयास प्रत्येक भारतवासी के लिए एक **प्रेरणा है कि धर्म हिंसा से नहीं, अपितु अहिंसा से फलता-फूलता है

आइए, हम सभी यह संकल्प लें कि हम हर जीव में आत्मा का अंश देखें, और अपने कर्मों से इस धरती को और अधिक करुणामय एवं आध्यात्मिक उन्नत  बनाएं।

हर जीव है अनमोल — आइए, मिलकर करें उनकी रक्षा।

 

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