भूमिका: दीपावली को विश्व सम्मान, पर गाँव की कलाओं का क्या? (Introduction: Diwali Earns Global Recognition, But What About Village Folk Arts?)
इस वर्ष की दीपावली ख़ास है। 10 दिसंबर 2025 को दिल्ली के लाल किले में आयोजित यूनेस्को समिति के सत्र में दीपावली को “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। यह इस सूची में भारत का 16वाँ तत्व है, और यह पहली दीपावली है जब हम इसे विश्व धरोहर के रूप में मना रहे हैं।
पर एक कड़वा सच भी है। जिन गाँवों में यह त्योहार अपने असली रंग में जीवित है मिट्टी के दीये, आँगन की रंगोली, लोकगीत, दीवारों पर बने चित्र वहीं की कई पारंपरिक कलाएँ आज धीरे-धीरे लुप्त हो रही हैं। बुज़ुर्ग कलाकार जा रहे हैं, और नई पीढ़ी शहरों की ओर जा रही है।
लोक कला गाँव की सामूहिक स्मृति है। इसमें हमारे देवी-देवता, ऋतुएँ, खेती, संस्कार और जीवन-दर्शन संजोए हुए हैं। इस लेख में जानिए कि भारत की लोक कलाएँ क्यों अनमोल हैं, उन्हें क्या ख़तरा है, उन्हें कैसे बचाया जा सकता है, और सनातन सांस्कृतिक संघ अपनी अध्यक्षा श्रीमती हरिप्रिया भार्गव के मार्गदर्शन में इस दिशा में क्या कर रहा है।
सनातन परंपरा में कला: मनोरंजन नहीं, साधना (Art in Sanatan Tradition: Not Just Entertainment, but Spiritual Practice)
सनातन संस्कृति में कला को कभी केवल मनोरंजन नहीं माना गया। वह ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग, समाज को शिक्षा देने का माध्यम और जीवन को सुंदर बनाने की साधना है।
- नाट्यशास्त्र – पंचम वेद: भरतमुनि का नाट्यशास्त्र स्वयं को “नाट्यवेद” कहता है। परंपरा के अनुसार इसमें ऋग्वेद से पाठ, सामवेद से गीत, यजुर्वेद से अभिनय और अथर्ववेद से रस लिए गए।
- 64 कलाएँ: भागवत पुराण के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और बलराम ने गुरु सांदीपनि के आश्रम में 64 दिनों में 64 कलाएँ सीखी थीं। संगीत, नृत्य, चित्रकला, वास्तुकला, पाक-कला – सब इन कलाओं में आते हैं।
- देव-स्वरूप में कला: माँ सरस्वती विद्या और कला की अधिष्ठात्री हैं, भगवान शिव नटराज रूप में सृष्टि का नृत्य करते हैं, और श्रीकृष्ण की बाँसुरी व रासलीला लोक संगीत-नृत्य की प्रेरणा हैं।
- संस्कार और उत्सव से जुड़ाव: गाँव की लोक कला हर संस्कार और ऋतु से जुड़ी है – विवाह के मंगलगीत, जन्म के सोहर, फसल के गीत, नवरात्रि का गरबा, दीपावली की रंगोली और दीये, और आँगन-दीवारों पर बने मांगलिक चित्र।
इसलिए जब कोई लोक कला लुप्त होती है, तो केवल एक हुनर नहीं, बल्कि उससे जुड़ा पूरा ज्ञान, आस्था और जीवन-दृष्टि खो जाती है।
भारत के गाँवों की प्रमुख लोक कलाएँ (Major Folk Arts of Indian Villages)
भारत में हर कुछ कोस पर बोली बदलती है, और उसके साथ कला भी। ये कलाएँ अधिकतर गाँवों और जनजातीय समुदायों में जन्मी और पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आई हैं:
राज्य | चित्र और शिल्प कला | नृत्य, संगीत और नाट्य |
गुजरात | पिठोरा चित्रकला, कच्छ की रोगन कला, पटोला बुनाई | गरबा, भवाई लोक नाट्य |
राजस्थान | फड़ चित्रकला, मांडणा | कालबेलिया, घूमर |
बिहार | मधुबनी (मिथिला) चित्रकला | छठ के लोकगीत, बिदेसिया |
महाराष्ट्र | वारली चित्रकला | लावणी, पोवाड़ा |
ओडिशा | पट्टचित्र | गोटीपुआ, संबलपुरी लोक नृत्य, छऊ (मयूरभंज) |
उत्तराखंड | ऐपण | रम्माण, जागर |
मध्य प्रदेश | गोंड और भील चित्रकला | बधाई नृत्य |
पश्चिम बंगाल | पटचित्र, डोकरा धातु शिल्प | बाउल गीत, छऊ (पुरुलिया) |
झारखंड | सोहराई और खोवर चित्रकला | छऊ (सरायकेला), पाइका |
केरल | भित्ति चित्र | थेय्यम, कूडियाट्टम |
आंध्र प्रदेश / तेलंगाना | कलमकारी, चेरियाल पट | बुर्रकथा |
यूनेस्को सूची में भारत के 16 तत्व: वैदिक मंत्रोच्चार, रामलीला, कूडियाट्टम, रम्माण (उत्तराखंड), मुडियेट्टु (केरल), कालबेलिया, छऊ, लद्दाख का बौद्ध मंत्रोच्चार, मणिपुर का संकीर्तन, जंडियाला गुरु (पंजाब) के ठठेरों का पीतल-ताँबा शिल्प, योग, नवरोज़, कुंभ मेला, कोलकाता की दुर्गा पूजा, गुजरात का गरबा और दीपावली। इनमें से अधिकांश की जड़ें गाँवों और लोक समुदायों में हैं। बिहार की छठ पूजा को अगले चक्र के लिए नामांकित किया गया है (स्रोत)।
लोक कलाओं पर मंडराते ख़तरे (Threats Facing India’s Folk Arts)
लोक कला किसी संग्रहालय में नहीं, लोगों के जीवन में जीवित रहती है। जब जीवन बदलता है और कलाकार को सम्मान व आजीविका नहीं मिलती, तो कला सबसे पहले टूटती है। आज ये प्रमुख ख़तरे हैं:
- पीढ़ियों का टूटता सिलसिला: लोक कला गुरु-शिष्य या माता-पिता से संतान तक मौखिक रूप से चलती है। युवाओं के पलायन से यह कड़ी टूट रही है।
- आजीविका का संकट: कई लोक कलाकार अपनी कला से परिवार नहीं चला पाते, इसलिए अगली पीढ़ी उसे अपनाना नहीं चाहती।
- मशीनी नकल: हाथ से बने चित्र और वस्त्रों की सस्ती मशीनी नकलें बाज़ार में आ जाती हैं, जिससे असली कारीगर को उचित दाम नहीं मिलता।
- बोलियों का लुप्त होना: लोकगीत और लोककथाएँ स्थानीय बोलियों में बसती हैं। यूनेस्को के अनुसार भारत की लगभग 200 भाषाएँ-बोलियाँ संकटग्रस्त हैं, और भाषा के साथ उसके गीत भी चले जाते हैं।
- संस्कारों का सरलीकरण: विवाह और त्योहारों में डीजे और रेडीमेड सजावट ने लोकगीतों, हाथ की रंगोली और पारंपरिक चित्रों की जगह ले ली है।
- हीनभावना: “गँवई” या “पुराना” कहकर अपनी ही कला से दूरी बनाना सबसे बड़ा ख़तरा है।
अच्छी बात यह है कि हर ख़तरे का समाधान भी हमारे पास है – बस समाज, सरकार और संगठनों को मिलकर काम करना होगा।
लोक कला और संस्कृति को कैसे बचाएँ: समाज और सरकार की भूमिका (How to Preserve Folk Art and Culture: The Role of Society and Government)
लोक कला तभी बचेगी जब वह गाँव के लिए गर्व और आजीविका दोनों बनेगी। इसके लिए समाज के स्तर पर ये कदम सबसे प्रभावी हैं:
- घर-परिवार से शुरुआत: बच्चों को दादी-नानी के लोकगीत, लोककथाएँ और त्योहारों की पारंपरिक विधियाँ सिखाएँ। इस दीपावली रेडीमेड स्टिकर की जगह हाथ से रंगोली या मांडणा बनाएँ।
- संस्कारों में लोक कला लौटाएँ: विवाह, जनेऊ और गृहप्रवेश में लोकगीत गाने वाली मंडलियों और स्थानीय चित्रकारों को आमंत्रित करें।
- गाँव का सांस्कृतिक दस्तावेज़ बनाएँ: बुज़ुर्ग कलाकारों के गीत, कथाएँ और तकनीकें मोबाइल से रिकॉर्ड करें और सुरक्षित रखें। जो लिखा या रिकॉर्ड नहीं हुआ, वह एक पीढ़ी में खो सकता है।
- कलाकार को बाज़ार दें: लोक चित्र, हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पाद सीधे कलाकार से ख़रीदें। GI टैग वाले असली उत्पाद को प्राथमिकता दें।
- ग्रामीण उत्सव और पर्यटन: गाँव के मेलों, लोक नाट्य और नृत्य को ग्रामीण पर्यटन से जोड़ें, ताकि शहर के लोग आएँ और कलाकार को आय मिले।
- विद्यालयों में लोक कला: स्थानीय कलाकारों को स्कूलों में सप्ताह में एक बार कक्षा लेने बुलाएँ।
सरकार की प्रमुख पहलें:
- संगीत नाटक अकादमी: लोक और पारंपरिक प्रदर्शन कलाओं का संरक्षण करती है और अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की राष्ट्रीय सूची को अद्यतन रखती है।
- सात क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र (ZCC): संस्कृति मंत्रालय के ये केंद्र लोक कलाओं के प्रदर्शन, प्रशिक्षण और गुरु-शिष्य परंपरा योजना के माध्यम से युवा कलाकारों को तैयार करते हैं।
- भौगोलिक संकेतक (GI) टैग: किसी क्षेत्र की विशिष्ट कला को कानूनी पहचान देकर नकल से बचाता है।
- पीएम विश्वकर्मा योजना: पारंपरिक शिल्पकारों को प्रशिक्षण, टूलकिट और सस्ता ऋण देती है (विवरण हमारे “कुटीर उद्योग” वाले लेख में)।
विरासत तभी बचती है जब वह जीवित रहती है – इसलिए लक्ष्य कला को संग्रहालय में रखना नहीं, गाँव के जीवन में वापस लाना है।
सनातन सांस्कृतिक संघ: संस्कृति के संरक्षण का जन-अभियान (Sanatan Sanskritik Sangh: A People’s Movement to Preserve Culture)
सनातन सांस्कृतिक संघ एक अखिल भारतीय धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठन है, जिसका उद्देश्य मोक्षलक्षी वैदिक, जैन, बौद्ध और सिख धर्मों को जाति-वर्ण से ऊपर उठकर एकत्रित करना और धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराओं का सही, शास्त्रोक्त प्रचार-प्रसार करना है। संघ मानता है कि सनातन धर्म किसी एक संप्रदाय का नाम नहीं, बल्कि एक शाश्वत जीवन-पद्धति है – और लोक कला उसी जीवन-पद्धति की सबसे सुंदर अभिव्यक्ति है।
संघ की अध्यक्षा श्रीमती हरिप्रिया भार्गव के मार्गदर्शन में TVDP – समग्र ग्राम विकास कार्यक्रम गाँव के आर्थिक विकास के साथ उसकी सांस्कृतिक आत्मा को भी जगाने का संकल्प लेता है। TVDP के संकल्पों में शामिल हैं:
- शांति, श्रद्धा और शौर्य के मूल्यों से सनातन परंपरा को जागृत करना तथा सामाजिक समरसता, राष्ट्रभाव और सांस्कृतिक चेतना को सुदृढ़ करना
- पाठशालाओं और संस्कार केंद्रों के माध्यम से बच्चों को उसी आयु में संस्कार देना, जब वे जीवनभर के लिए मन में बसते हैं – जैसे तक्षशिला और नालंदा की गुरुकुल परंपरा में होता था
- वैदिक, जैन, बौद्ध और सिख परंपराओं, उनके उत्सवों और जीवन-मूल्यों की स्पष्ट जानकारी देना
- सामूहिक कार्यक्रमों और संकल्प सत्रों के माध्यम से बच्चों, युवाओं और बुज़ुर्गों को एक मंच पर लाना, ताकि बुज़ुर्गों का अनुभव और ज्ञान नई पीढ़ी तक पहुँचे
- गाँव के महाजनों और वरिष्ठों के अनुभव और मार्गदर्शन से समाज में संतुलन बनाए रखना
TVDP की आत्मा “आशामा” में “आ” आर्थिक के साथ आत्मिक उन्नति का भी प्रतीक है। लोक कला, लोकगीत और उत्सव गाँव की आत्मिक उन्नति के सबसे स्वाभाविक साधन हैं। जब कलाकार को कुटीर उद्योग और स्वरोजगार से आजीविका मिलती है, और समाज से सम्मान, तब कला अपने आप जीवित रहती है – यही TVDP का समग्र दृष्टिकोण है।
निष्कर्ष: विरासत को जीएँ, तभी वह बचेगी
दीपावली को विश्व-धरोहर का सम्मान मिलना हम सबके लिए गर्व का क्षण है। पर यह सम्मान तभी सार्थक है जब गाँव का कुम्हार दीये बनाता रहे, आँगन में रंगोली सजती रहे, लोकगीत गूँजते रहें और कलाकार की अगली पीढ़ी भी उसी गर्व से अपनी कला अपनाए।
लोक कला हमारी सनातन संस्कृति की जड़ें हैं। जड़ें सूखेंगी तो वृक्ष भी नहीं बचेगा। इसलिए इस दीपावली संकल्प लें – कम से कम एक स्थानीय कलाकार से कुछ ख़रीदेंगे, एक लोकगीत बच्चों को सिखाएँगे और एक पारंपरिक कला को अपने घर में स्थान देंगे।
सनातन सांस्कृतिक संघ अध्यक्षा श्रीमती हरिप्रिया भार्गव के नेतृत्व में TVDP के माध्यम से गाँव-गाँव में इसी सांस्कृतिक जागरण का कार्य कर रहा है। आप भी सदस्य बनकर सेवा, यात्राओं और आयोजनों में सहभागी बनें।
आज ही निःशुल्क सदस्यता लें: sanatansanskrutiksangh.org/sadasyata
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सनातन से जुड़ना, स्वयं और समाज को बचाना है। जय सनातन, जय भारत।
Frequently Asked Questions (FAQ)
प्रश्न 1: लोक कला किसे कहते हैं?
लोक कला वह पारंपरिक कला है जो किसी क्षेत्र या समुदाय के आम लोगों के जीवन, आस्था और उत्सवों से जन्म लेती है और पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक व व्यावहारिक रूप से चलती है। जैसे मधुबनी, वारली, पिठोरा चित्रकला, गरबा नृत्य और लोकगीत।
प्रश्न 2: क्या दीपावली यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में है?
हाँ। 10 दिसंबर 2025 को दीपावली को यूनेस्को की “मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत” की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया गया। यह इस सूची में भारत का 16वाँ तत्व है।
प्रश्न 3: गुजरात की कौन-सी लोक कलाएँ प्रसिद्ध हैं?
गरबा (2023 से यूनेस्को सूची में), भवाई लोक नाट्य, पिठोरा चित्रकला, कच्छ की रोगन कला और पाटन का पटोला गुजरात की प्रसिद्ध लोक कलाएँ हैं।
प्रश्न 4: लोक कलाएँ लुप्त क्यों हो रही हैं?
पलायन, कलाकारों की कमज़ोर आजीविका, मशीनी नकल, स्थानीय बोलियों का घटता प्रयोग और नई पीढ़ी की अपनी परंपरा से दूरी इसके मुख्य कारण हैं।
प्रश्न 5: आम नागरिक लोक कला बचाने में कैसे मदद कर सकता है?
लोक कलाकारों से सीधे उत्पाद ख़रीदकर, संस्कारों और त्योहारों में लोकगीत-रंगोली जैसी परंपराएँ लौटाकर, बुज़ुर्गों का ज्ञान रिकॉर्ड करके और बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़कर।
प्रश्न 6: सनातन सांस्कृतिक संघ संस्कृति संरक्षण में क्या करता है?
सनातन सांस्कृतिक संघ अपनी अध्यक्षा श्रीमती हरिप्रिया भार्गव के मार्गदर्शन में TVDP के तहत पाठशालाओं, संस्कार केंद्रों, संकल्प सत्रों और सामूहिक आयोजनों के माध्यम से गाँवों में सनातन संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने का कार्य करता है। संघ की सदस्यता निःशुल्क है।





