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भारतीय संस्कृति में संस्कारों का महत्व और उनकी भूमिका

“संस्कारो हि नाम संस्कार्यस्य गुणाधानेन वा स्यात्, दोषापनयनेन वा।”
— महर्षि पाणिनि

अर्थात्, संस्कार वह प्रक्रिया है जो व्यक्ति में उत्कृष्ट गुणों को जोड़ती है और दोषों को दूर करती है।

भारत एकमात्र ऐसी सभ्यता है जो हजारों वर्षों से निरंतर जीवित है, न इसलिए कि यहाँ बड़े साम्राज्य थे, न इसलिए कि यहाँ अपार धन-सम्पदा थी, बल्कि इसलिए कि यहाँ संस्कार थे। संस्कार वह अदृश्य धागा है जो एक पीढ़ी को दूसरी पीढ़ी से जोड़ता है, जो एक बच्चे को मनुष्य से महामानव बनाता है और जो एक परिवार को समाज की नींव बनाता है।

आज जब पश्चिमी जीवनशैली, डिजिटल संस्कृति और भोगवाद की लहर भारत की नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से काट रही है, तब यह और भी आवश्यक हो जाता है कि हम समझें: संस्कार क्या हैं, उनका महत्व क्या है और भारतीय संस्कृति में उनकी क्या भूमिका रही है। और यह भी समझें कि सनातन सांस्कृतिक संघ किस प्रकार आज के युग में उन संस्कारों को पुनः जीवित करने का महायज्ञ कर रहा है।

संस्कार का वास्तविक अर्थ, महज रीति-रिवाज नहीं(Meaning of Sanskar)

आम बोलचाल में लोग “संस्कार” का अर्थ केवल जन्म, विवाह या मृत्यु से जुड़ी धार्मिक रस्में समझ लेते हैं। लेकिन सनातन दृष्टि में “संस्कार” का अर्थ इससे कहीं अधिक विशाल और गहरा है।

संस्कृत में “संस्कार” का अर्थ है: “सम् + कार”, यानी समग्र रूप से किया गया वह कार्य जो व्यक्ति को परिष्कृत, पवित्र और श्रेष्ठ बनाता है। जैसे सोने को तपाने पर उसकी खरा होता है, जैसे पत्थर को तराशने पर वह मूर्ति बनता है, ठीक उसी तरह एक मनुष्य को सही संस्कारों से तराशने पर वह एक आदर्श व्यक्तित्व, एक श्रेष्ठ परिवार का सदस्य, एक जिम्मेदार समाज का नागरिक और एक गर्वित राष्ट्र का सपूत बनता है।

महर्षि वेदव्यास ने कहा है:

“अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम्।
परोपकारः पुण्याय, पापाय परपीडनम्॥”

यह केवल एक श्लोक नहीं, एक संस्कार है जो पीढ़ियों को यह सिखाता है कि दूसरों की भलाई ही पुण्य है और दूसरों को कष्ट देना ही पाप। जब यह संस्कार बचपन से ही मन में बैठ जाए तो कोई व्यक्ति जीवन में कभी स्वार्थी, अत्याचारी या दिशाहीन नहीं बन सकता।

Sixteen Sanskars

सोलह संस्कार, जन्म से मृत्यु तक का पवित्र मार्ग(Sixteen Sanskars)

भारतीय संस्कृति में मनुष्य के जीवन को एक यज्ञ की तरह देखा गया है, और इस यज्ञ में सोलह आहुतियाँ होती हैं जिन्हें षोडश संस्कार कहते हैं। ये संस्कार जीवन के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर व्यक्ति को सही दिशा और ऊर्जा देते हैं।

गर्भधारण से पहले गर्भाधान संस्कार, गर्भ में पल रहे शिशु के लिए पुंसवन और सीमन्तोन्नयन संस्कार, जन्म के बाद जातकर्म, नामकरण के लिए नामकरण संस्कार, बच्चे की पहली बाहरी यात्रा के लिए निष्क्रमण, पहला अन्न खिलाने के लिए अन्नप्राशन, पहले बाल काटने के लिए चूडाकर्म और विद्यारंभ के लिए विद्यारंभ संस्कार, ये सब इस बात के प्रमाण हैं कि भारतीय संस्कृति ने जीवन के प्रत्येक पड़ाव को एक आध्यात्मिक और सामाजिक अवसर के रूप में देखा।

उपनयन संस्कार

उपनयन संस्कार, जब बालक गुरुकुल में प्रवेश करता था, यह केवल विद्या की शुरुआत नहीं थी, बल्कि जीवन के उस महान अनुशासन की शुरुआत थी जो उसे आगे चलकर एक श्रेष्ठ नागरिक, योद्धा, विद्वान या संत बनाती थी। भारतीय गुरुकुल परंपरा और वैदिक शिक्षा के महत्व को समझने के लिए वैदिक शिक्षा का महत्व और वैदिक शिक्षा क्या है पढ़ा जा सकता है।

विवाह संस्कार

विवाह संस्कार केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं था, यह दो परिवारों, दो जीवन-मूल्यों और दो संस्कार-धाराओं का पवित्र संगम था।

अंत्येष्टि संस्कार

अंत्येष्टि संस्कार यह स्मरण कराता है कि यह देह नश्वर है और आत्मा अमर, इसलिए जीवन भर ऐसे कर्म करो जो आत्मा को शुद्ध और समाज को लाभ पहुँचाएँ।

इन सोलह संस्कारों का सामूहिक संदेश एक ही है: जीवन को उत्सव की तरह जियो, लेकिन उत्तरदायित्व की भावना के साथ।

परिवार, संस्कारों की पहली पाठशाला(Family as First School)

“माता प्रथमो गुरुः”

माँ ही पहली गुरु है। यह कोई कविता नहीं, यह भारतीय संस्कृति की वह गहरी समझ है जो जानती है कि एक बच्चे के व्यक्तित्व की नींव उसके घर में पड़ती है। जो बच्चा माँ की गोद में सत्य, करुणा, साहस और सेवा के संस्कार सीखता है, वह बड़ा होकर किसी भी परिस्थिति में अपना नैतिक मार्ग नहीं भटकता।

भारतीय परिवार में सुबह उठकर माता-पिता और बड़ों के चरण स्पर्श करना, यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि विनम्रता और कृतज्ञता का वह संस्कार है जो बच्चे में अहंकार को पनपने नहीं देता।

साथ बैठकर भोजन करना, यह केवल खाना नहीं, बल्कि परिवार की एकता, साझेपन और प्रेम का वह संस्कार है जो बच्चे को यह सिखाता है कि जीवन में सबसे बड़ी दौलत रिश्ते हैं।

घर में होने वाली पूजा, दीपावली, होली, जन्माष्टमी के उत्सव, दादा-दादी की कहानियाँ, ये सब मिलकर वह अदृश्य विश्वविद्यालय बनाते हैं जहाँ बच्चा जीवन जीना सीखता है।

आज जब परिवार टूट रहे हैं, एकल परिवारों में बच्चे अकेले बड़े हो रहे हैं और मोबाइल-इंटरनेट ने दादी की लोरी की जगह ले ली है, तब यह संस्कारों का संकट सबसे गहरा हो गया है।

गुरुकुल और विद्यालय, संस्कारों का विस्तार(Gurukul Education)

परिवार के बाद संस्कारों का दूसरा केंद्र था: गुरुकुल।

तक्षशिला और नालंदा जैसे महान विश्वविद्यालय इसलिए नहीं बने थे कि वहाँ केवल गणित, खगोलशास्त्र या दर्शन पढ़ाया जाए। वे इसलिए बने थे क्योंकि भारतीय मनीषियों को पता था कि ज्ञान तभी फलता-फूलता है जब उसकी जड़ों में संस्कार हों।

गुरुकुल में विद्यार्थी केवल पुस्तकें नहीं पढ़ता था, वह गुरु के साथ रहकर सेवा सीखता था, प्रकृति के साथ जीकर पर्यावरण का सम्मान सीखता था, सामूहिक जीवन में भागीदार बनकर समरसता सीखता था और प्रतिदिन के अनुशासन में जीकर आत्मसंयम सीखता था।

यही कारण था कि गुरुकुल से निकले विद्यार्थी न केवल विद्वान होते थे, बल्कि चरित्रवान, साहसी और समाजसेवी भी होते थे। आचार्य चाणक्य, आर्यभट्ट, भास्कराचार्य, वाग्भट्ट, ये सब उसी संस्कार-शिक्षा की देन थे।

त्योहार और उत्सव, संस्कारों का सामूहिक उत्सव(Festivals and Values)

भारत में कोई भी त्योहार केवल मनोरंजन के लिए नहीं मनाया जाता। प्रत्येक उत्सव के पीछे एक गहरा संस्कार-संदेश छुपा होता है। भारतीय सांस्कृतिक आयोजनों की भूमिका को सनातन संस्कृति को संरक्षित करने में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की भूमिका में विस्तार से समझाया गया है।

दीपावली

अंधकार पर प्रकाश की विजय का संस्कार, यह सिखाती है कि जीवन में चाहे कितना भी अँधेरा हो, एक छोटा दीप पर्याप्त है।

होली

रंग और समरसता का संस्कार, यह सिखाती है कि भेदभाव भुलाकर एक-दूसरे से मिलो।

राम नवमी

मर्यादा और धर्म का संस्कार। श्रीराम का पूरा जीवन ही एक जीवंत संस्कार-पुस्तक है जो बताती है कि वचन निभाना, माता-पिता का सम्मान करना, अन्याय का प्रतिकार करना और प्रजा की सेवा करना, यही राजधर्म है और यही मानव-धर्म है। धर्म और नैतिकता के महत्व को सत्य और धर्म का महत्व में समझाया गया है।

बुद्ध पूर्णिमा

करुणा, अहिंसा और आत्मबोध का संस्कार।

गुरु पूर्णिमा

कृतज्ञता और विनम्रता का संस्कार।

जब ये सब संस्कार जीवन में उतरते हैं तो एक साधारण मनुष्य असाधारण बन जाता है।

संस्कारों का संकट, आज की सबसे बड़ी चुनौती(Crisis of Sanskars)

आज की पीढ़ी के सामने जो सबसे बड़ा संकट है वह धन का नहीं, तकनीक का नहीं, बल्कि संस्कारों का संकट है। जिस बच्चे को उसकी जड़ों का ज्ञान नहीं, वह पढ़-लिखकर भी अपनी मिट्टी से कट जाता है।

जो युवा केवल डिग्री लेकर बड़ा होता है लेकिन जिसे यह नहीं पता कि सेवा क्या है, करुणा क्या है, अपने बुजुर्गों का सम्मान कैसे करें, वह समाज के लिए भार बन जाता है।

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भी यह सिद्ध किया है कि बच्चे के मस्तिष्क का ९०% विकास ५ से १२ वर्ष की आयु में होता है। और इसी आयु में जो संस्कार बोए जाते हैं वे जीवनभर उसके व्यवहार, उसके निर्णयों और उसके चरित्र को आकार देते हैं।

यदि इस उम्र में हम बच्चों को मोबाइल गेम और सोशल मीडिया के हवाले कर देते हैं और उन्हें न भजन सिखाते हैं, न सेवा की आदत डालते हैं, n बड़ों का आदर करना सिखाते हैं, तो हम आने वाली पीढ़ी के साथ सबसे बड़ा अन्याय कर रहे हैं।

सनातन सांस्कृतिक संघ, संस्कारों का जीवंत केंद्र(Sanatan Sanskritik Sangh)

इसी संकट का समाधान लेकर खड़ा है: सनातन सांस्कृतिक संघ (SSS)। यह केवल एक संगठन नहीं, बल्कि संस्कार और सेवा से जुड़ा एक विशाल परिवार है।

संघ की राष्ट्रीय अध्यक्षा श्रीमती हरिप्रिया भार्गव जी के कुशल और प्रेरणादायी नेतृत्व में यह संगठन आज गाँव-गाँव, घर-घर में उन संस्कारों की अलख जगा रहा है जो हमारी पहचान हैं, हमारी विरासत हैं और हमारी सबसे बड़ी शक्ति हैं।

संघ का मूल विश्वास है:

“सच्ची प्रगति वही है जहाँ आधुनिकता के साथ अपनी संस्कृति और मूल्यों की रक्षा हो।”

संघ यह भी मानता है कि सनातन धर्म किसी एक संप्रदाय का नाम नहीं है, यह वह शाश्वत जीवन-पद्धति है जो वैदिक, जैन, बौद्ध और सिख, सभी मोक्षलक्षी परंपराओं को जाति-वर्ण से ऊपर उठकर एक सूत्र में पिरोती है।

सनातन संस्कार सूची

संघ की “सनातन संस्कार सूची” पुस्तक इसी दिशा में एक अमूल्य उपकरण है। इस पुस्तक में रोज़मर्रा के संस्कार, मंत्र, प्रतिज्ञा और व्यवहार-निर्देश दिए गए हैं।

इसे प्रतिदिन पढ़ने से जीवन में अनुशासन, सकारात्मक सोच और आत्मिक शुद्धता का विकास होता है। यह पुस्तक परिवार में सम्मान और समरसता जगाती है, बच्चों में सही दिशा स्थापित करती है और राष्ट्र-प्रेम तथा सांस्कृतिक गौरव को रोज़मर्रा की आदतों में बदलती है।

TVDP and Aashama 2

TVDP और आशामा, संस्कारों का गाँव-गाँव तक विस्तार(TVDP and Aashama)

सनातन सांस्कृतिक संघ की सबसे क्रांतिकारी पहल है: TVDP (Total Village Development Program, समग्र ग्राम विकास कार्यक्रम)।

इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह गाँव को केवल भौतिक रूप से नहीं, बल्कि संस्कार, स्वावलंबन और समरसता से सशक्त बनाने का संकल्प लेकर चलता है।

TVDP यह जानता है कि गाँव का विकास तभी स्थायी होगा जब गाँव के प्रत्येक व्यक्ति, बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक, माँ से लेकर युवा तक, के भीतर संस्कार जागृत हों। इसीलिए इस कार्यक्रम की आत्मा है: “आशामा”।

“आशामा हृदि दीपोऽस्ति, कर्मरात्रौ प्रकाशकः।
श्रद्धया पालितो नित्यं, धर्ममार्गप्रवर्तकः॥”

आर्थिक एवं आत्मिक उन्नति

आशामा का “आ” अर्थात् आर्थिक एवं आत्मिक उन्नति। जब गाँव का किसान प्राकृतिक खेती अपनाता है तो वह न केवल आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होता है, बल्कि धरती माँ के प्रति कृतज्ञता का वह संस्कार भी जीवित करता है जो हमारे पूर्वजों में था।

जब माँ-बहन कौशल विकास से स्वावलंबी बनती है तो वह अपने बच्चों को सबसे बड़ा संस्कार देती है: आत्मनिर्भरता का।

शारीरिक सशक्तता

आशामा का “शा” अर्थात् शारीरिक सशक्तता। योग, प्राणायाम और आयुर्वेद के माध्यम से गाँव के प्रत्येक व्यक्ति को स्वस्थ जीवन की ओर ले जाना।

जब गाँव में नशामुक्ति का संस्कार जड़ पकड़ता है, जब युवा शराब छोड़कर योग की ओर मुड़ते हैं, तब एक पूरी पीढ़ी बदल जाती है।

मानसिक संतुलन व विकास

आशामा का “मा” अर्थात् मानसिक संतुलन व विकास। सत्संग, संस्कार शिक्षा, पारंपरिक संगीत-नृत्य और सामाजिक समरसता के माध्यम से मन को संस्कारयुक्त बनाना।

जब गाँव में महाजन एकत्र होकर आपसी विवाद सुलझाते हैं, जब जाति-वर्ण से ऊपर उठकर सभी एक पंगत में बैठते हैं, तब समरसता का वह संस्कार जीवित होता है जो भारत की असली पहचान है। “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना को वसुधैव कुटुंबकम् का महत्व में समझाया गया है।

इन तीनों आयामों ko मिलाकर TVDP वह आदर्श सनातन गाँव बनाने का स्वप्न साकार कर रहा है जिसमें हर बच्चा संस्कारवान हो, हर युवा दिशाबद्ध हो और हर परिवार समृद्ध एवं संतुष्ट हो।

हमारे कार्यक्रम, जहाँ संस्कार जीवन बन गए(Major Programs)

सनातन सांस्कृतिक संघ ने अब तक जो कार्यक्रम आयोजित किए हैं, वे सभी इस संस्कार-पुनरुद्धार की यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।

संकल्प सत्र

स्थान: कनकने वाटिका, चिरगाँव एवं श्री 1008 बजरंगदास हनुमान मंदिर, बानपुर (जिला ललितपुर)

संकल्प सत्र वह आयोजन है जहाँ शास्त्र, संस्कार और संकल्प, तीनों एक साथ जीवंत होते हैं।

कनकने वाटिका, चिरगाँव में हुए संकल्प सत्र में समाज के विभिन्न वर्गों के लोग एकत्र हुए और पंचभूत, अग्नि, जल, आकाश, वायु और धरती, की साक्षी में सनातन धर्म, सामाजिक समरसता और राष्ट्रहित के लिए संकल्प लिया।

बानपुर के हनुमान मंदिर में भी इसी भावना को दोहराया गया: गौ-गंगा-गाँव रक्षा, पर्यावरण संरक्षण और “वसुधैव कुटुंबकम्” की भावना को आत्मसात करने का संकल्प।

यह केवल धार्मिक आयोजन नहीं था, यह उस पुरातन भारतीय परंपरा का पुनरुद्धार था जहाँ सार्वजनिक रूप से संकल्प लेना सबसे बड़ा संस्कार माना जाता था।

संकल्प लेने वाला व्यक्ति समाज के प्रति उत्तरदायी बन जाता है, और यही संस्कारों की सबसे बड़ी शक्ति है।

संस्कार पाठशाला और युवा मार्गदर्शन

TVDP के अंतर्गत गाँव-गाँव में संस्कार पाठशालाएँ और संस्कार केंद्र स्थापित किए जा रहे हैं। इनमें बच्चों को न केवल पाठ्यक्रम की शिक्षा मिलti है, बल्कि सत्य, अहिंसा, सेवा, करुणा, राष्ट्रप्रेम और सांस्कृतिक गर्व के संस्कार भी दिए जाते हैं।

तक्षशिला और नालंदा की परंपरा को पुनर्जीवित करते हुए आशामा उसी परंपरा को आज के गाँव-गाँव में साकार कर रहा है।

युवाओं को नशामुक्ति, शारीरिक प्रशिक्षण, कौशल विकास और सेवा के संस्कारों से जोड़कर उन्हें अपने गाँव का नेतृत्वकर्ता और रक्षक बनाया जा रहा है।

मातृशक्ति सशक्तिकरण

माँ ही संस्कारों की पहली पाठशाला है। TVDP में मातृशक्ति को केंद्र में रखते हुए उन्हें प्राकृतिक खेती, कुटीर उद्योग, स्वास्थ्य-स्वच्छता और बाल संस्कार के क्षेत्र में सक्रिय भागीदार बनाया जाता है।

जब एक माँ स्वावलंबी बनती है, जब वह अपने बच्चों को सनातन मूल्य सिखाती है और जब वह समाज के निर्णयों में सहभागी बनती है, तब संस्कारों की वह धारा पुनः प्रवाहित होती है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती है।

राम नवमी, नृसिंह जयंती, बुद्ध पूर्णिमा और डॉ. अंबेडकर जयंती

संघ द्वारा आयोजित इन पर्व-उत्सवों में शांति, श्रद्धा और शौर्य के सनातन संस्कारों को जन-जन तक पहुँचाया गया।

श्रीराम का जीवन मर्यादा और धर्म का संस्कार है। भगवान नृसिंह का अवतार सत्य और न्याय का संस्कार है। भगवान बुद्ध का मार्ग करुणा और संतुलन का संस्कार है। और बाबासाहेब डॉ. अंबेडकर का जीवन यह सिखाता है कि विषम परिस्थितियों में भी संस्कार और शिक्षा की शक्ति से हर बाधा पार की जा सकती है।

इन सभी पर्वों के माध्यम से संघ ने यह सिद्ध किया है कि वैदिक, जैन, बौद्ध और सिख, सभी मोक्षलक्षी परंपराओं के संस्कार एक ही लक्ष्य की ओर जाते हैं: मानवता की सेवा और आत्मकल्याण।

मंदिर स्वच्छता और शास्त्रोक्त पूजा अभियान

मंदिर भारतीय संस्कारों का सबसे प्राचीन केंद्र है। जब मंदिर स्वच्छ और सक्रिय होता है तो पूरे गाँव की सांस्कृतिक चेतना जागृत होती है।

संघ के इस अभियान में गाँव-गाँव के मंदिरों में शास्त्रोक्त पूजा-पद्धति की पुनर्स्थापना की गई और स्वच्छता का संकल्प लिया गया। समाज सेवा और सांस्कृतिक जागरण से जुड़े कार्यों को सामाजिक सेवा गतिविधियाँ तथा सनातन अभियान में देखा जा सकता है।

मंदिर की घंटियाँ, मंत्रोच्चार और सामूहिक आरती, ये सब वे संस्कार हैं जो मन को एकाग्र करते हैं, समाज को जोड़ते हैं और पीढ़ियों को एक साझी पहचान देते हैं।

उपसंहार, संस्कार बचाओ, भारत बचाओ(Conclusion)

“संस्कारः श्रेष्ठतां दत्ते, चरित्रं जीवनाधारम्।
यत्र संस्कारो वसति, तत्र ईश्वरो निवसति॥”

जहाँ संस्कार है, वहाँ ईश्वर का वास है। जहाँ चरित्र है, वहाँ सफलता की कोई कमी नहीं।

भारत की असली शक्ति उसकी सेना नहीं, उसकी तकनीक नहीं, उसकी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि उसके संस्कार हैं। वे संस्कार जो एक माँ अपने बच्चे को लोरी के साथ देती है, वे संस्कार जो एक गुरु अपने शिष्य को ज्ञान के साथ देता है, वे संस्कार जो एक गाँव अपने उत्सवों में सामूहिक रूप से जीता है, यही भारत की अमर पहचान है।

सनातन सांस्कृतिक संघ इसी अमर पहचान को बचाने और बढ़ाने का संकल्प लेकर चल रहा है। TVDP का आशामा वह पवित्र दीप है जो गाँव-गाँव में संस्कारों का उजियारा फैला रहा है।

जब हर गाँव में संस्कार पाठशाला होगी, जब हर माँ अपने बच्चे को सनातन मूल्य सिखाएगी, जब हर युवा नशे की जगह सेवा को चुनेगा और जब हर परिवार संस्कारयुक्त जीवन जीएगा, तभी वह स्वर्णिम भारत पुनः साकार होगा जिसकी कल्पना हमारे ऋषियों, संतों और महापुरुषों ने की थी।

आइए, हम सब मिलकर इस संस्कार-यज्ञ में अपनी आहुति दें। अपने घर में, अपने गाँव में, अपने समाज में संस्कारों की उस ज्योति को जलाए रखें जो हजारों वर्षों से जलती आई है।

गाँव बदलेगा, तभी देश बदलेगा।
संस्कार बचेगा, तभी भारत बचेगा।

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