Facebook Pixel Tracker
Importance of Indian Cultural Heritage
भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना क्यों जरूरी है
June 26, 2026

भारतीय संस्कृति और प्रकृति संरक्षण का संबंध जहाँ धर्म ही पर्यावरण रक्षा है

आज पूरा विश्व जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, घटते जंगल और सूखती नदियों के संकट से जूझ रहा है। बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हो रहे हैं, करोड़ों रुपये पर्यावरण संरक्षण पर खर्च हो रहे हैं, फिर भी धरती का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। ऐसे समय में जब दुनिया समाधान खोज रही है, तब उत्तर हमारी अपनी भारतीय संस्कृति में हज़ारों वर्षों से मौजूद है।

भारतीय संस्कृति और प्रकृति संरक्षण का संबंध कोई नया विचार नहीं है यह हमारी सनातन जीवन-पद्धति की आत्मा है। हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रकृति को कभी ‘संसाधन’ नहीं माना, बल्कि ‘माता’ माना। हमने नदियों को देवी कहा, वृक्षों की पूजा की, पर्वतों को पवित्र माना, गाय को माता का स्थान दिया और पृथ्वी को ‘धरती माँ’ कहकर प्रणाम किया। यही कारण है कि सनातन संस्कृति में धर्म और पर्यावरण संरक्षण एक-दूसरे से अलग नहीं, बल्कि एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त कहता है “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात् यह भूमि मेरी माता है और मैं इसका पुत्र हूँ। जब कोई सभ्यता धरती को माँ मानती है, तो उसका शोषण कैसे कर सकती है? यही वह मूल भावना है जो भारतीय संस्कृति को विश्व की सबसे पर्यावरण-अनुकूल जीवन-पद्धति बनाती है।

वसुधैव कुटुंबकम्: संपूर्ण सृष्टि एक परिवार है (Vasudhaiva Kutumbakam: The World Is One Family)

भारतीय संस्कृति का मूल मंत्र है ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ अर्थात् संपूर्ण वसुधा (पृथ्वी) ही हमारा परिवार है। इस परिवार में केवल मनुष्य नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, वृक्ष-वनस्पति, नदी-पर्वत और प्रत्येक जीवमात्र सम्मिलित है।

ईशावास्योपनिषद् का पहला ही मंत्र कहता है “ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्” इस जगत में जो कुछ भी है, उसमें ईश्वर का वास है। जब हर पत्ते में, हर जल-बूँद में, हर जीव में परमात्मा का दर्शन होता है, तो प्रकृति का विनाश स्वयं ईश्वर का अपमान बन जाता है। यही दृष्टि सनातन धर्म में पर्यावरण संरक्षण की आधारशिला है।

पश्चिमी चिंतन जहाँ प्रकृति को ‘जीतने’ की वस्तु मानता रहा, वहीं भारतीय चिंतन ने प्रकृति के साथ ‘सह-अस्तित्व’ का मार्ग दिखाया। हमारे यहाँ उपभोग नहीं, उपयोग की संस्कृति है उतना ही लो जितना आवश्यक है, और जो लो उसे लौटाने का भाव रखो। यही ‘यज्ञ भावना’ है: प्रकृति से प्राप्त करो और कृतज्ञता के साथ प्रकृति को अर्पित करो।

पंचमहाभूत: भारतीय पर्यावरण विज्ञान की नींव (Panch Mahabhuta: The Foundation of Indian Environmental Science)

सनातन दर्शन के अनुसार यह संपूर्ण सृष्टि और स्वयं हमारा शरीर पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से निर्मित है। यह केवल दार्शनिक सिद्धांत नहीं, बल्कि पर्यावरण संतुलन का संपूर्ण विज्ञान है।

1. पृथ्वी तत्व मिट्टी की रक्षा

हमारी परंपरा में प्रातः उठते ही भूमि को स्पर्श कर क्षमा माँगने का विधान है “समुद्रवसने देवि पर्वतस्तनमण्डले, विष्णुपत्नि नमस्तुभ्यं पादस्पर्शं क्षमस्व मे।” यह भावना मिट्टी के प्रति सम्मान सिखाती है। रासायनिक खाद से मिट्टी को ज़हरीला बनाना इस परंपरा के विरुद्ध है, इसीलिए हमारे पूर्वज गोबर की खाद और प्राकृतिक खेती करते थे।

2. जल तत्व नदियाँ हमारी माताएँ

गंगा, यमुना, नर्मदा, गोदावरी, कावेरी भारत में नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, जीवनदायिनी देवियाँ हैं। जल को देवता मानकर उसे प्रदूषित न करने का संस्कार हर भारतीय को बचपन से मिलता था।

3. अग्नि तत्व ऊर्जा की पवित्रता

यज्ञ और हवन की परंपरा वातावरण शुद्धि का प्राचीन विज्ञान है। गाय के घी से हवन करने पर वातावरण शुद्ध होता है और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

4. वायु तत्व प्राणवायु का सम्मान

वायु को ‘प्राण’ कहा गया है। पीपल, वट, नीम जैसे अधिक ऑक्सीजन देने वाले वृक्षों को पूजनीय बनाकर हमारे ऋषियों ने वायु शुद्धि की स्थायी व्यवस्था की।

5. आकाश तत्व ध्वनि और अंतरिक्ष की शुद्धता

मंत्रोच्चार, घंटानाद और शंखध्वनि आकाश तत्व को शुद्ध करते हैं। मंदिर की घंटियाँ नकारात्मक ऊर्जा को नष्ट करती हैं यह अंधविश्वास नहीं, हमारी सनातन परंपरा का विज्ञान है।

जब इन पाँचों तत्वों का संरक्षण और संवर्धन होता है, तभी पर्यावरण संतुलित रहता है। पंचमहाभूत पर्यावरण संरक्षण ही वास्तव में आधुनिक ‘इकोलॉजी’ का प्राचीन भारतीय स्वरूप है।

वृक्ष पूजा: हरियाली को देवत्व का सम्मान (Tree Worship: Honoring Nature Through Sacred Trees)

भारतीय संस्कृति विश्व की एकमात्र ऐसी संस्कृति है जहाँ वृक्षों की विधिवत पूजा होती है। यह वृक्ष पूजा का महत्व केवल आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण की सबसे प्रभावी सामाजिक व्यवस्था रही है। भारतीय प्रकृति संरक्षण परंपरा में वृक्षों को जीवन, देवत्व और पर्यावरण संतुलन के प्रतीक के रूप में सम्मान दिया गया है। 

  • पीपल भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, “अश्वत्थः सर्ववृक्षाणाम्” वृक्षों में मैं पीपल हूँ। पीपल सर्वाधिक ऑक्सीजन देने वाला वृक्ष है।
  • तुलसी हर आँगन में तुलसी का पौधा औषधीय गुणों का भंडार और वायु शुद्धि का प्राकृतिक साधन है।
  • वट वृक्ष वट सावित्री व्रत के माध्यम से महिलाएँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी वटवृक्ष की रक्षा करती आई हैं।
  • नीम, आँवला, बेल इन सभी वृक्षों को धार्मिक महत्व देकर उनका संरक्षण सुनिश्चित किया गया।

मत्स्य पुराण में कहा गया है “दशकूपसमा वापी, दशवापीसमो ह्रदः, दशह्रदसमः पुत्रो, दशपुत्रसमो द्रुमः” दस कुओं के बराबर एक बावड़ी, दस बावड़ियों के बराबर एक तालाब, दस तालाबों के बराबर एक पुत्र और दस पुत्रों के बराबर एक वृक्ष होता है। सोचिए, जिस संस्कृति में एक वृक्ष का मूल्य दस पुत्रों के समान हो, वहाँ वनों की रक्षा स्वाभाविक धर्म बन जाती है।

राजस्थान के बिश्नोई समाज का इतिहास इसका जीवंत प्रमाण है, जहाँ अमृता देवी और 363 बिश्नोइयों ने खेजड़ी के वृक्षों की रक्षा के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। विश्व का प्रसिद्ध ‘चिपको आंदोलन’ भी इसी भारतीय वृक्ष-प्रेम की परंपरा से जन्मा।

गौ माता: पर्यावरण और अर्थव्यवस्था की धुरी (Gau Mata: The Pillar of Environment and Rural Economy)

भारतीय संस्कृति में गाय को ‘माता’ कहा गया है, और यह सम्मान केवल भावनात्मक नहीं, वैज्ञानिक भी है। आधुनिक विज्ञान आज स्वीकार कर रहा है कि गाय के गोबर में 300 से अधिक पोषक तत्व हैं जो मिट्टी को जीवित करते हैं। गौ गंगा गाँव संरक्षण की भारतीय परंपरा में गौ-सेवा को पर्यावरण संतुलन, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक जीवन-पद्धति का महत्वपूर्ण आधार माना गया है।

गौ-सेवा और पर्यावरण संरक्षण का संबंध समझिए:

  • गोबर से बनी जैविक खाद रासायनिक उर्वरकों का सर्वोत्तम विकल्प है, जो भूमि की उर्वरता बनाए रखती है।
  • गोमूत्र प्राकृतिक कीटनाशक का कार्य करता है, जिससे ज़हरीले रसायनों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है।
  • गोबर गैस (बायोगैस) स्वच्छ ऊर्जा का स्रोत है, जो गाँवों को ऊर्जा में आत्मनिर्भर बना सकती है।
  • गाय आधारित प्राकृतिक खेती से किसान की लागत घटती है और मुनाफ़ा बढ़ता है।

इसीलिए हमारे पूर्वजों ने गाय को अर्थव्यवस्था, कृषि, स्वास्थ्य और पर्यावरण चारों की धुरी बनाया। जिस दिन गाय सड़क पर भटकने लगे और खेत ज़हर से भर जाएँ, उस दिन समझ लीजिए कि हम अपनी माँ को भूल चुके हैं।

गंगा और नदी संस्कृति: जल संरक्षण की सनातन परंपरा (Ganga and River Culture: The Eternal Tradition of Water Conservation)

भारत ‘नदी-मातृक’ देश है, अर्थात् नदियों को माता मानने वाला देश। गंगा संरक्षण केवल एक नदी की सफाई का विषय नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की आस्था, आजीविका और सभ्यता की रक्षा का प्रश्न है।

वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि गंगाजल में ‘बैक्टीरियोफेज’ नामक तत्व पाया जाता है, जिसके कारण गंगाजल वर्षों तक शुद्ध रहता है। हमारे ऋषियों ने यह ज्ञान हज़ारों वर्ष पहले ही प्राप्त कर लिया था, इसीलिए गंगाजल को अमृत तुल्य माना गया।

कुंभ मेला, छठ पूजा, गंगा दशहरा, नदी आरती ये सभी पर्व जल स्रोतों के साथ समाज के जीवंत संबंध को बनाए रखते हैं। जब करोड़ों लोग नदी को माँ मानकर उसकी आरती करते हैं, तो नदी की रक्षा जन-आंदोलन बन जाती है। यही भारतीय संस्कृति में जल संरक्षण की शक्ति है।

पर्व-त्योहार: प्रकृति के साथ उत्सव का संबंध (Festivals: The Connection Between Celebrations and Nature)

भारतीय पर्वों को ध्यान से देखें तो पाएंगे कि लगभग हर त्योहार किसी न किसी रूप में प्रकृति, ऋतु परिवर्तन और पर्यावरण से जुड़ा हुआ है। भारतीय त्योहारों का महत्व केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि ये पर्व हमें प्रकृति के प्रति कृतज्ञता, संरक्षण और संतुलित जीवन का संदेश भी देते हैं। 

  • मकर संक्रांति सूर्य उपासना और ऋतु परिवर्तन का पर्व
  • वसंत पंचमी वसंत ऋतु और प्रकृति के श्रृंगार का स्वागत
  • होली फसल पकने का उत्सव, पलाश के फूलों से प्राकृतिक रंग
  • वट सावित्री और हरियाली तीज वृक्षों और हरियाली की पूजा
  • नाग पंचमी सर्पों जैसे जीवों के संरक्षण का संदेश
  • गोवर्धन पूजा पर्वत, गौ और प्रकृति की पूजा का अद्भुत पर्व
  • तुलसी विवाह पौधे को परिवार का सदस्य बनाने की परंपरा
  • छठ पूजा सूर्य और जल स्रोतों के प्रति कृतज्ञता

गोवर्धन पूजा की कथा तो प्रकृति संरक्षण का सर्वोत्तम उदाहरण है भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र की पूजा के स्थान पर गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाकर यह संदेश दिया कि जो पर्वत, वन और गौचर भूमि हमें जीवन देते हैं, उनकी रक्षा और पूजा ही सच्चा धर्म है।

प्राकृतिक खेती: धरती माँ की सेवा का मार्ग (Natural Farming: A Path to Serve Mother Earth)

हरित क्रांति के बाद रासायनिक खेती ने उत्पादन तो बढ़ाया, परंतु मिट्टी की उर्वरता, भूजल और किसानों का स्वास्थ्य तीनों को गहरी क्षति पहुँचाई। आज समाधान के रूप में विश्व फिर से प्राकृतिक खेती की ओर लौट रहा है, जो भारतीय कृषि परंपरा का मूल स्वरूप है।

प्राकृतिक खेती के लाभ:

  1. कम लागत, अधिक मुनाफ़ा: किसान महंगे रासायनिक उर्वरक और कीटनाशकों पर निर्भर नहीं रहता।
  2. मिट्टी की उर्वरता: गोबर, गोमूत्र और जीवामृत से भूमि जीवित रहती है और स्थायी कृषि उत्पादन सुनिश्चित होता है।
  3. शुद्ध अन्न, स्वस्थ समाज: ज़हरमुक्त भोजन से रोगों में कमी आती है।
  4. जल और वायु की शुद्धता: रसायनों का प्रयोग न होने से भूजल और वातावरण प्रदूषित नहीं होते।
  5. ग्राम आत्मनिर्भरता: गाँव की अर्थव्यवस्था गाँव में ही सशक्त होती है।

जब प्राकृतिक खेती, गौ-सेवा और पंचमहाभूत संरक्षण एक साथ कार्य करते हैं, तब गाँव आत्मनिर्भर, स्थायी और सशक्त बनता है। यही सच्चे अर्थों में ‘ग्राम स्वराज’ है।

आधुनिक पर्यावरण संकट और सनातन समाधान (Modern Environmental Crisis and Sanatan Solutions)

आज विश्व जिन संकटों से जूझ रहा है, उनका मूल कारण है प्रकृति को केवल ‘उपभोग की वस्तु’ मानना। ग्लोबल वार्मिंग, प्लास्टिक प्रदूषण, जल संकट, वायु प्रदूषण और जैव विविधता का विनाश ये सब उसी उपभोगवादी सोच के परिणाम हैं।

भारतीय संस्कृति इसका समाधान तीन स्तरों पर देती है:

  1. दृष्टि परिवर्तन: प्रकृति का संसाधन नहीं, माता है। जब दृष्टि बदलती है, तो व्यवहार स्वतः बदल जाता है।
  2. जीवनशैली परिवर्तन: ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ की संस्कृति। आवश्यकता के अनुसार उपभोग, मितव्ययिता और पुनः उपयोग की परंपरा यही आज का ‘सस्टेनेबल लिविंग’ है, जो हमारे यहाँ सदियों से जीवन-पद्धति रही है।
  3. सामूहिक संस्कार: पर्यावरण रक्षा को कानून नहीं, संस्कार बनाना। जब बच्चा तुलसी को जल देना, पक्षियों को दाना डालना और नदी को प्रणाम करना घर में सीखता है, तो वह जीवनभर प्रकृति का रक्षक बनता है।

महात्मा गांधी जी ने कहा था “पृथ्वी प्रत्येक मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, परंतु किसी एक के लालच को नहीं।” यही भारतीय संस्कृति का सार है।

सनातन सांस्कृतिक संघ: संस्कृति से संरक्षण की ओर (Sanatan Sanskritik Sangh: From Culture to Conservation)

इसी सनातन दृष्टि को जन-जन तक पहुँचाने का कार्य कर रहा है सनातन अभियान के माध्यम से सनातन सांस्कृतिक संघ, एक अखिल भारतीय धार्मिक, सांस्कृतिक एवं सामाजिक संगठन, जिसका उद्देश्य मोक्षलक्षी वैदिक, जैन, बौद्ध और सिख धर्मों को जाति-वर्ण से ऊपर उठकर एकत्रित व सशक्त करना और गौ-गंगा-गाँव संरक्षण, प्राकृतिक खेती, पंचभूत पर्यावरण एवं प्रत्येक जीवमात्र की रक्षा तथा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को जागृत करना है। 

समग्र ग्राम विकास कार्यक्रम (TVDP)

संघ के समग्र ग्राम विकास कार्यक्रम (TVDP) में प्राकृतिक खेती, गौ-सेवा और पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश के संरक्षण व संवर्धन को गाँव की आत्मनिर्भरता और अर्थव्यवस्था के मूल स्तंभ के रूप में देखा जाता है। यह कार्यक्रम गाँव-गाँव में उस प्राचीन ज्ञान को पुनः जीवित कर रहा है, जो हमारे ऋषियों ने हज़ारों वर्ष पहले जान लिया था।

संकल्प सत्र पंचभूतों की साक्षी में

संघ द्वारा आयोजित सनातन संकल्प सत्रों में समाज के विभिन्न वर्ग एकत्र होकर पंचभूत अग्नि, जल, आकाश, वायु और धरती की साक्षी में धर्म, संस्कृति, पर्यावरण संरक्षण और गौ-गंगा-गाँव रक्षा का संकल्प लेते हैं। यह केवल आयोजन नहीं, बल्कि सनातन विचार से कर्म की यात्रा है।

हम सब क्या कर सकते हैं? पर्यावरण संरक्षण के व्यावहारिक उपाय (Practical Steps for Environmental Conservation)

भारतीय संस्कृति के अनुसार पर्यावरण रक्षा किसी सरकार या संस्था का नहीं, प्रत्येक व्यक्ति का धर्म है। आइए, इन सरल संकल्पों से शुरुआत करें:

  1. प्रतिदिन तुलसी को जल दें और घर-आँगन में पौधे लगाएँ।
  2. जन्मदिन, विवाह और शुभ अवसरों पर वृक्षारोपण की परंपरा शुरू करें।
  3. नदियों और जल स्रोतों में कचरा, प्लास्टिक या पूजन सामग्री न डालें। श्रद्धा स्वच्छता से प्रकट करें।
  4. गौ-सेवा करें और गाय आधारित उत्पादों (जैविक खाद, पंचगव्य) को अपनाएँ।
  5. प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन दें, जैविक अन्न खरीदें और किसानों का समर्थन करें।
  6. प्लास्टिक का त्याग करें, कपड़े के थैले, मिट्टी के दीये और पत्तल जैसी पारंपरिक वस्तुएँ अपनाएँ।
  7. जल और बिजली की मितव्ययिता को दैनिक संस्कार बनाएँ।
  8. बच्चों को प्रकृति-प्रेम के संस्कार दें क्योंकि 5 से 12 वर्ष की आयु में बोए गए संस्कार जीवनभर साथ रहते हैं।
  9. पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी की व्यवस्था करें जीवमात्र की रक्षा ही सनातन धर्म है।
  10. पर्यावरण संरक्षण और समाज कल्याण के लिए किए जाने वाले सामाजिक सेवा कार्य भी इसी सेवा भावना का महत्वपूर्ण भाग हैं। 
  11. सनातन सांस्कृतिक संघ जैसे संगठनों से जुड़ें और सामूहिक प्रयासों का हिस्सा बनें।

निष्कर्ष: प्रकृति की रक्षा में ही हमारी रक्षा है (Conclusion)

भारतीय संस्कृति और प्रकृति संरक्षण का संबंध माता और संतान के संबंध से है। हमारे ऋषियों ने जो जीवन-पद्धति दी, वह आज के ‘सस्टेनेबल डेवलपमेंट’ और ‘क्लाइमेट एक्शन’ से हज़ारों वर्ष आगे की सोच थी। पंचमहाभूत का सिद्धांत, वृक्ष पूजा, नदी आरती, गौ-सेवा, प्राकृतिक खेती और वसुधैव कुटुंबकम् की भावना ये केवल परंपराएँ नहीं, बल्कि धरती को बचाने का संपूर्ण विज्ञान हैं।

आज आवश्यकता है कि हम अपनी जड़ों की ओर लौटें। जब हम अपनी सनातन संस्कृति को जिएँगे, तो प्रकृति संरक्षण अलग से करने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी वह हमारे जीवन का स्वाभाविक अंग बन जाएगा। यही भारत का वह अमूल्य उपहार है, जो संपूर्ण विश्व को पर्यावरण संकट से बचा सकता है।

धर्मो रक्षति रक्षितः जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। और स्मरण रखिए, प्रकृति की रक्षा ही सबसे बड़ा धर्म है।

सनातन परिवार से जुड़ें 

यदि आप भी गौ-गंगा-गाँव संरक्षण, प्राकृतिक खेती, पंचभूत पर्यावरण रक्षा और सनातन संस्कृति के इस पुण्य कार्य में सहभागी बनना चाहते हैं, तो आज ही सनातन सांस्कृतिक संघ की निःशुल्क सदस्यता लें। यह केवल एक सदस्यता नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के भविष्य के प्रति आपकी जिम्मेदारी है।

📞 संपर्क करें: +91 98250 32067 / +91 98250 32070
🔗 निःशुल्क सदस्यता लिंक: https://sanatansanskrutiksangh.org/sadasyata/

 

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

प्रश्न 1: भारतीय संस्कृति में प्रकृति संरक्षण का क्या महत्व है? 

उत्तर: भारतीय संस्कृति में प्रकृति को माता माना गया है। वेद, उपनिषद और पुराणों में पृथ्वी, जल, वायु, वृक्ष और जीवों की रक्षा को धर्म का अंग बताया गया है। पंचमहाभूत संरक्षण, वृक्ष पूजा, नदी पूजा और गौ-सेवा इसी परंपरा के अंग हैं।

प्रश्न 2: पंचमहाभूत क्या हैं और पर्यावरण से इनका क्या संबंध है? 

उत्तर: पंचमहाभूत पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश वे पाँच तत्व हैं जिनसे सृष्टि और मानव शरीर बने हैं। इनका संतुलन ही पर्यावरण संतुलन है, इसलिए इनका संरक्षण व संवर्धन ही सच्ची पर्यावरण रक्षा है।

प्रश्न 3: गौ-सेवा से पर्यावरण को क्या लाभ होता है? 

उत्तर: गाय के गोबर में 300 से अधिक पोषक तत्व होते हैं जो मिट्टी को जीवित करते हैं। गोबर की खाद और गोमूत्र से प्राकृतिक खेती संभव होती है, जिससे भूमि, जल और वायु शुद्ध रहते हैं तथा किसानों की आय बढ़ती है।

प्रश्न 4: प्राकृतिक खेती क्या है और इसके क्या लाभ हैं? 

उत्तर: प्राकृतिक खेती वह पद्धति है जिसमें रासायनिक उर्वरकों के स्थान पर गोबर, गोमूत्र और जैविक साधनों का उपयोग होता है। इससे लागत कम होती है, मुनाफ़ा बढ़ता है, मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है और शुद्ध अन्न प्राप्त होता है।

प्रश्न 5: सनातन सांस्कृतिक संघ पर्यावरण संरक्षण के लिए क्या कार्य करता है? 

उत्तर: संघ समग्र ग्राम विकास कार्यक्रम (TVDP) के माध्यम से गौ-गंगा-गाँव संरक्षण, प्राकृतिक खेती, पंचभूत पर्यावरण रक्षा और जीवमात्र की रक्षा का कार्य करता है, तथा संकल्प सत्रों द्वारा समाज में पर्यावरण चेतना जागृत करता है। आप निःशुल्क सदस्यता लेकर इस कार्य में सहभागी बन सकते हैं।

Stories

Other Stories

June 26, 2026

भारतीय सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित करना क्यों जरूरी है

भारत विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सभ्यताओं में से एक है। यहाँ की संस्कृति केवल ग्रंथों, मंदिरों या ऐतिहासिक स्मारकों तक सीमित नहीं है, बल्कि […]
June 23, 2026

सांस्कृतिक कार्यक्रम समाज में जागरूकता कैसे बढ़ाते हैं

किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी आर्थिक स्थिति, तकनीकी विकास या भौतिक उपलब्धियों से नहीं होती, बल्कि उसकी संस्कृति, परंपराओं, संस्कारों और सामाजिक चेतना से […]
Translate »

You cannot copy content of this page