अर्थात् चित्रकूट वह महातीर्थ है जहाँ मुनि और सिद्धजन सदा निवास करते हैं, और जहाँ श्रीराम ने सीताजी को आश्वस्त करते हुए एक वर्ष से अधिक का सुखद वास किया।
भारत में कुछ स्थान ऐसे हैं जो केवल भूगोल नहीं होते वे भावना होते हैं, आस्था होते हैं और एक सम्पूर्ण जीवन-दर्शन होते हैं। चित्रकूट ऐसा ही एक दिव्य स्थान है। मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की सीमा पर विंध्य की गोद में, पवित्र मंदाकिनी नदी के किनारे बसा यह तीर्थ केवल एक भौगोलिक स्थान नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का दर्पण है।
यहाँ श्रीराम ने वनवास काटा, यहाँ माँ सीता ने अपनी पतिव्रता की परीक्षा दी, यहाँ लक्ष्मण ने भ्रातृभक्ति का आदर्श स्थापित किया और यहाँ महर्षि वाल्मीकि, महर्षि अत्रि, अनुसूया और दत्तात्रेय जैसे महान ऋषियों की तपस्याओं ने इस भूमि को इतना पवित्र बना दिया कि आज भी यहाँ की मिट्टी उठाने से मन शांत हो जाता है।
सनातन सांस्कृतिक संघ (SSS) और उसके TVDP समग्र ग्राम विकास कार्यक्रम की दृष्टि में चित्रकूट जैसे तीर्थ केवल दर्शनीय स्थल नहीं, बल्कि वे जीवित सांस्कृतिक विश्वविद्यालय हैं जो हर श्रद्धालु को राम के आदर्शों से जोड़कर जीवन जीने की कला सिखाते हैं। आइए, इस दिव्य भूमि के धार्मिक और सांस्कृतिक इतिहास की यात्रा करें।
चित्रकूट नाम का रहस्य और भौगोलिक परिचय (Mystery of the Name Chitrakoot and Geographical Introduction)
चित्रकूट का शाब्दिक अर्थ है “चित्र” अर्थात् अद्भुत और “कूट” अर्थात् पर्वत शिखर अर्थात् वह अद्भुत पर्वत जो अपने अनगिनत अलौकिक दृश्यों और अनुभवों से मन को मोह लेता है। यह नाम इस भूमि पर पूरी तरह सटीक बैठता है क्योंकि यहाँ के हर पत्थर में, हर वृक्ष में, हर जल-धारा में एक ऐसा सौंदर्य और आध्यात्मिक चुंबकत्व है जो मनुष्य को बार-बार यहाँ खींच लाता है।
भौगोलिक दृष्टि से चित्रकूट मध्यप्रदेश के सतना जिले और उत्तरप्रदेश के चित्रकूट जिले में विस्तृत है। यहाँ से मंदाकिनी नदी बहती है जो पयस्विनी के नाम से भी जानी जाती है। कामदगिरि पर्वत जो चित्रकूट का हृदय है इस पूरे तीर्थ का केंद्र बिंदु है। इस पर्वत की परिक्रमा श्रद्धालु प्रतिदिन करते हैं और ऐसी मान्यता है कि इस पर्वत की परिक्रमा करने से जीवन के समस्त कष्ट दूर होते हैं और मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
यहाँ का रामघाट जहाँ प्रतिदिन संध्या आरती होती है लाखों श्रद्धालुओं का वह पावन केंद्र है जहाँ दीपकों की रोशनी में मंदाकिनी की लहरों पर जब शंख-घंटी की आवाज़ गूँजती है तो ऐसा लगता है कि स्वर्ग इसी धरती पर उतर आया है।
वाल्मीकि रामायण में चित्रकूट राम की प्रथम वनगृह (Chitrakoot in Valmiki Ramayana – Rama’s First Forest Abode)
श्रीराम के जीवन में चित्रकूट का स्थान अत्यंत विशेष है। जब अयोध्या से वनवास की यात्रा आरंभ हुई तो श्रीराम, सीताजी और लक्ष्मण ने प्रयागराज में महर्षि भारद्वाज के आश्रम में ठहरकर उनसे पूछा “हे महर्षि, वनवास बिताने के लिए कौन सा स्थान उचित रहेगा?” और महर्षि भारद्वाज ने उत्तर दिया “चित्रकूट।”
चित्रकूट में श्रीराम ने पर्णकुटी बनाई। यहाँ उन्होंने वन-जीवन जिया धनुष-बाण लेकर आखेट किया, मंदाकिनी में स्नान किया, ऋषियों के आश्रम में जाकर शिक्षा ग्रहण की और “धर्म को जीवन में कैसे उतारें” इसका व्यावहारिक उदाहरण प्रस्तुत किया।
यहीं निषादराज गुह के साथ श्रीराम की वह मैत्री स्थापित हुई जो भारतीय संस्कृति की सामाजिक समरसता का अनूठा प्रमाण है राजकुमार राम ने एक निषाद को गले लगाया, उसके साथ भोजन किया, उसे भाई की तरह सम्मान दिया। यही वह समरसता है जिसे सनातन सांस्कृतिक संघ अपने TVDP के माध्यम से आज गाँव-गाँव में जीवित करने का प्रयास कर रहा है।
यहीं भरत अयोध्या से सेना लेकर आए राज्य देने के लिए नहीं, बल्कि श्रीराम के चरण-पादुकाएँ लेने के लिए। वह प्रसंग जब भरत ने अपने बड़े भाई के सामने माथा टेका यह भारतीय संस्कृति की उस भ्रातृ-भक्ति और त्याग की परंपरा का सर्वोच्च उदाहरण है जो सदियों से भारतीय परिवारों को एकजुट रखती है।
ऋषि-मुनियों की तपोभूमि चित्रकूट का वैदिक वैभव (Tapobhoomi of Sages – Vedic Glory of Chitrakoot)
चित्रकूट केवल श्रीराम के वनवास की भूमि नहीं यह हजारों वर्षों से ऋषियों, मुनियों और सिद्धजनों की तपोभूमि रही है। यहाँ की हर पहाड़ी, हर गुफा और हर वृक्ष किसी न किसी ऋषि की साधना से पवित्र हुए हैं।
महर्षि अत्रि और माँ अनुसूया का आश्रम
महर्षि अत्रि और माँ अनुसूया का आश्रम यहाँ माँ अनुसूया ने जब ब्रह्मा, विष्णु और महेश को शिशु बना दिया था, वह प्रसंग भारतीय संस्कृति में स्त्री की आत्मशक्ति और पतिव्रत की सर्वोच्च मिसाल है। यह आश्रम आज भी अस्तित्व में है और यहाँ सती अनुसूया की पूजा होती है।
भगवान दत्तात्रेय का जन्मस्थान
भगवान दत्तात्रेय का जन्मस्थान माँ अनुसूया और महर्षि अत्रि के पुत्र भगवान दत्तात्रेय जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश के त्रिगुणात्मक अवतार माने जाते हैं का जन्म इसी चित्रकूट की भूमि पर हुआ। दत्तात्रेय जी का सम्पूर्ण जीवन-दर्शन यह सिखाता है कि सच्चे गुरु हर जगह मिलते हैं यदि शिष्य की पात्रता हो। यह वह विनम्रता और जिज्ञासा का संस्कार है जो बुंदेलखंड की परंपरा में गहरे रचा-बसा है।
महर्षि वाल्मीकि का आश्रम
महर्षि वाल्मीकि का आश्रम रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मीकि का आश्रम भी चित्रकूट के निकट था। जब रावण-वध के बाद सीताजी को वनवास मिला, तब उन्होंने इसी आश्रम में शरण ली और यहीं लव-कुश का जन्म हुआ। लव-कुश ने यहीं वाल्मीकि से रामकथा सीखी और अयोध्या में श्रीराम के सामने गाकर सुनाई यह घटना भारतीय सांस्कृतिक इतिहास की सबसे मर्मस्पर्शी कहानियों में से एक है।
महर्षि मार्कण्डेय, शरभंग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्य
महर्षि मार्कण्डेय, शरभंग, सुतीक्ष्ण और अगस्त्य इन सभी महान ऋषियों के आश्रम चित्रकूट के वनों में थे। जब श्रीराम यहाँ वन-विहार करते थे तो इन ऋषियों से ज्ञान, शास्त्र और धर्म की चर्चा करते थे। यही वह परंपरा थी जो राजकुमारों को केवल शस्त्र-विद्या नहीं बल्कि शास्त्र-ज्ञान और जीवन-दर्शन भी देती थी।
चित्रकूट के प्रमुख धार्मिक स्थल आस्था की जीवंत यात्रा (Major Religious Sites of Chitrakoot)
कामदगिरि
यह चित्रकूट का सबसे पवित्र स्थल है। इस पर्वत को स्वयं श्रीराम का देहस्वरूप माना जाता है। ५ किलोमीटर की परिक्रमा में भक्त नंगे पाँव पर्वत की प्रदक्षिणा करते हैं। पर्वत के चारों ओर अनेक मंदिर बने हैं। कामदगिरि का अर्थ है “जो मनोकामना पूर्ण करे” और सच में यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं का अनुभव है कि यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा उनके जीवन को एक नई दिशा देती है।
रामघाट
मंदाकिनी नदी के किनारे बना यह घाट चित्रकूट का सबसे जीवंत केंद्र है। यहाँ प्रतिदिन प्रातःकाल और संध्याकाल भव्य आरती होती है। घाट पर बैठकर जब सामने की पहाड़ियों से उगते सूरज को देखते हैं या संध्या में दीपों की रोशनी में मंदाकिनी की लहरों को देखते हैं तब मन की सारी उद्विग्नता शांत हो जाती है।
स्फटिक शिला
यह वह शिला है जहाँ श्रीराम और सीताजी विश्राम करते थे और जहाँ जयंत नामक कौवे ने सीताजी के चरण पर चोंच मारी थी। इस शिला पर आज भी श्रीराम और सीता के चरण-चिह्न स्पष्ट दिखाई देते हैं।
गुप्त गोदावरी
यहाँ दो गुफाएँ हैं जिनमें से एक में गोदावरी नदी का उद्गम माना जाता है। इन गुफाओं में श्रीराम और लक्ष्मण ने विश्राम किया था। यहाँ का वातावरण इतना शांत और रहस्यमय है कि मन स्वयं ही ध्यान में लीन हो जाता है, जो प्रकृति और आध्यात्मिकता का संबंध को स्पष्ट रूप से दर्शाता है।
जानकी कुंड
यह वह कुंड है जहाँ माँ सीता स्नान करती थीं। मंदाकिनी के किनारे स्थित यह पावन स्थल आज भी उस दिव्य उपस्थिति का अहसास कराता है।
अनुसूया आश्रम
कामदगिरि से लगभग ३ किलोमीटर दूर स्थित यह आश्रम माँ अनुसूया की तपस्या की भूमि है। यहाँ के घने वन, कल-कल करती जल-धाराएँ और पक्षियों का कलरव यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जो सत्ययुग की याद दिलाता है।
हनुमान धारा
पहाड़ की ऊँचाई पर स्थित इस स्थान पर भगवान हनुमान की एक विशाल प्रतिमा है और ऊपर से एक जल-धारा निरंतर बहती है जो भगवान हनुमान के शरीर पर गिरती है। लंका-दहन के बाद जब हनुमानजी के शरीर का ताप शांत नहीं हो रहा था, तब श्रीराम ने यह जल-धारा प्रकट की थी ऐसी मान्यता है।
भरत मिलाप
यह वह पावन स्थल है जहाँ भरत और श्रीराम का मिलन हुआ था। यहाँ आज भी वह प्रेम, वह त्याग और वह भ्रातृभक्ति की अनुभूति होती है जो किसी भी संवेदनशील हृदय को गहराई से छूती है।
चित्रकूट की सांस्कृतिक परंपराएँ जब आस्था उत्सव बनती है (Cultural Traditions of Chitrakoot)
रामनवमी का महापर्व
चित्रकूट में राम नवमी का पर्व किसी और स्थान से कहीं अधिक विशेष होता है। लाखों श्रद्धालु देश के कोने-कोने से यहाँ आते हैं। कामदगिरि की परिक्रमा में उमड़ता जनसैलाब, रामघाट पर होने वाली महाआरती, भजन-कीर्तन और धार्मिक प्रवचनों की श्रृंखला यह सब मिलकर एक ऐसा वातावरण बनाते हैं जो मनुष्य के भीतर राम के आदर्शों को जागृत करता है।
कार्तिक मास में दीपोत्सव
कार्तिक मास में चित्रकूट का दृश्य अवर्णनीय होता है। हजारों दीपक मंदाकिनी की धारा पर तैरते हैं, रामघाट पूरी तरह प्रकाशमय हो जाता है और आकाश में उठती घंटियों की ध्वनि एक ऐसा वातावरण बनाती है जो आत्मा को तृप्त कर देती है।
मकर संक्रांति का मेला
मकर संक्रांति पर यहाँ विशाल मेला लगता है। लाखों श्रद्धालु मंदाकिनी में डुबकी लगाते हैं। यह मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं यह बुंदेलखंड की सामाजिक एकता और सामूहिक उत्सव का वह जीवंत उदाहरण है जहाँ सभी जाति, वर्ण और वर्गों के लोग एक साथ स्नान करते हैं।
रास-लीला और रामलीला की परंपरा
चित्रकूट में रामलीला की परंपरा सदियों पुरानी है। यहाँ की रामलीला में वह स्थानीय रंग और बुंदेली भाव होता है जो इसे विशेष बनाता है। पूरे मास भर चलने वाली रामलीला में गाँव-गाँव के लोग एकत्र होते हैं।
तुलसीदास की परंपरा
महाकवि गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस की रचना यद्यपि काशी में की, लेकिन उनका गहरा नाता चित्रकूट से था। कहा जाता है कि तुलसीदासजी ने चित्रकूट में श्रीराम के दर्शन किए थे। उनकी प्रसिद्ध पंक्ति है “चित्रकूट के घाट पर, भइ संतन की भीड़। तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर॥” यह चौपाई आज भी चित्रकूट के हर श्रद्धालु की ज़ुबान पर है।
चित्रकूट की ऋषि-परंपरा और आश्रम-संस्कृति (Rishi Tradition and Ashram Culture of Chitrakoot)
चित्रकूट की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ आज भी आश्रम-परंपरा जीवित है। सैकड़ों साधु-संत और ऋषि-परंपरा के उत्तराधिकारी यहाँ निवास करते हैं। इनमें सबसे प्रसिद्ध है जगद्गुरु रामभद्राचार्य जी का तुलसी पीठ जहाँ हजारों दिव्यांग और निर्धन विद्यार्थी निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करते हैं। यह आश्रम उस सनातन गुरुकुल परंपरा का आधुनिक रूप है जहाँ शिक्षा और संस्कार साथ-साथ चलते हैं, और यही परंपरा आगे चलकर वैदिक शिक्षा के मूल सिद्धांतों को भी दर्शाती है।
यहाँ की भरतकूप भी अत्यंत महत्वपूर्ण है जहाँ भरत ने विभिन्न तीर्थों से लाया जल डाला था। यह कुआँ आज भी पवित्र माना जाता है।
चित्रकूट की संत-परंपरा और आश्रम-संस्कृति यह सिद्ध करती है कि जब समाज की जड़ें आध्यात्मिकता में गहरी होती हैं, तब न केवल व्यक्ति बल्कि पूरा समाज और राष्ट्र सशक्त और संगठित रहता है। यही वह दर्शन है जिस पर सनातन सांस्कृतिक संघ खड़ा है।
चित्रकूट और सनातन सांस्कृतिक संघ एक साझा संकल्प (Chitrakoot and Sanatan Sanskritik Sangh)
सनातन सांस्कृतिक संघ (SSS) चित्रकूट जैसे तीर्थ-स्थानों को केवल धार्मिक पर्यटन का केंद्र नहीं मानता। संघ का मानना है कि ये स्थान भारत की सांस्कृतिक चेतना के जीवंत स्रोत हैं और इन्हें संरक्षित रखना, इनकी स्वच्छता सुनिश्चित करना और इनसे जुड़ी परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना यह प्रत्येक सनातन प्रेमी का धर्म है।
संघ का विश्वास है “इतिहास हमें मिला है अब इसे बचाना हमारी जिम्मेदारी है।” चित्रकूट के वे मंदिर जहाँ श्रीराम ने विश्राम किया, वे घाट जहाँ माँ सीता ने स्नान किया और वे वन जहाँ लक्ष्मण ने पहरा दिया ये सब हमारी सांस्कृतिक धरोहर हैं। इन्हें बचाने के लिए जरूरी है कि हम अपनी संस्कृति को समझें, नई पीढ़ी को जोड़ें और संरक्षण के प्रति जागरूक हों।
TVDP और आशामा चित्रकूट के आदर्शों को गाँव-गाँव उतारना (TVDP and Aashama: Bringing Chitrakoot’s Ideals to Every Village)
TVDP समग्र ग्राम विकास कार्यक्रम वास्तव में चित्रकूट के उन आदर्शों को गाँव-गाँव में साकार करने का प्रयास है जो श्रीराम ने वनवास काल में जीकर दिखाए।
“आशामा हृदि दीपोऽस्ति, कर्मरात्रौ प्रकाशकः। श्रद्धया पालितो नित्यं, धर्ममार्गप्रवर्तकः॥”
श्रीराम ने वनवास में क्या किया? उन्होंने प्रकृति के साथ सद्भाव में जीवन जिया यही आशामा के “आ” आयाम का सार है। उन्होंने शरीर को अनुशासित रखा, वन-जीवन की कठोरता में भी स्वस्थ रहे यही “शा” आयाम है। उन्होंने निषादराज से लेकर वानरों तक सबके साथ समरसता और सम्मान से व्यवहार किया यही “मा” आयाम है।
“आ” आर्थिक एवं आत्मिक उन्नति
“आ” आर्थिक एवं आत्मिक उन्नति के अंतर्गत TVDP चित्रकूट क्षेत्र के गाँवों में प्राकृतिक खेती और गौ-सेवा को बढ़ावा दे रहा है। जब मंदाकिनी के किनारे का किसान रासायनिक खेती छोड़कर गौमूत्र और जैविक खाद से खेती करता है तब वह वही आत्मिक उन्नति करता है जो श्रीराम ने वन में रहकर की थी।
“शा” शारीरिक सशक्तता
“शा” शारीरिक सशक्तता के अंतर्गत इस क्षेत्र में आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा को गाँव-गाँव तक पहुँचाया जा रहा है। वे जड़ी-बूटियाँ जो चित्रकूट के वनों में हैं और जिन्हें ऋषियों ने उपयोग किया उनका ज्ञान पुनः जन-सामान्य तक पहुँचाना TVDP का संकल्प है।
“मा” मानसिक संतुलन और विकास
“मा” मानसिक संतुलन और विकास के अंतर्गत सत्संग, संस्कार शिक्षा और सामाजिक समरसता को गाँव के जीवन का अनिवार्य अंग बनाया जा रहा है। जब गाँव में सत्संग होता है, जब लोग मिलकर रामकथा सुनते हैं, जब बच्चे राम के आदर्शों से परिचित होते हैं तब चित्रकूट की वह दिव्य चेतना गाँव-गाँव में उतरती है।
हमारे कार्यक्रम जहाँ चित्रकूट के आदर्श जीवंत हुए (Our Programs Where the Ideals of Chitrakoot Came Alive)
संकल्प सत्र कनकने वाटिका, चिरगाँव एवं बानपुर, ललितपुर
सनातन सांस्कृतिक संघ द्वारा आयोजित इन दोनों संकल्प सत्रों में चित्रकूट की वह परंपरा जीवंत हुई जहाँ श्रीराम ने स्वयं वनवास का संकल्प लेते समय पंचभूत की साक्षी में अपने धर्म-पालन का वचन दिया था। कनकने वाटिका में अग्नि, जल, आकाश, वायु और धरती की साक्षी में जो संकल्प लिए गए वे ठीक उसी परंपरा का अनुसरण थे जो चित्रकूट की धरती से आई है। बानपुर के संकल्प सत्र में गौ-गंगा-गाँव रक्षा और सांस्कृतिक संरक्षण का वचन उन्हीं मंदाकिनी के जल की पवित्रता से प्रेरित था जो हजारों साल से इस भूमि की आत्मा है।
राम नवमी महोत्सव श्रीराम का सांस्कृतिक उत्सव
सनातन सांस्कृतिक संघ द्वारा राम नवमी पर आयोजित कार्यक्रम में चित्रकूट के उन आदर्शों को केंद्र में रखा गया जो श्रीराम ने वनवास में जीकर दिखाए थे सेवा, समरसता, त्याग और धर्म-पालन। संघ ने यह भी सिद्ध किया कि राम केवल वैदिक परंपरा के नहीं वे जैन, बौद्ध और सिख सभी मोक्षलक्षी परंपराओं के उस सनातन आदर्श का नाम है जो जाति-वर्ण से ऊपर उठकर समस्त मानव जाति को प्रेम, करुणा और न्याय का मार्ग दिखाता है।
मंदिर स्वच्छता अभियान चित्रकूट की पवित्रता को जन-जन तक
जिस प्रकार चित्रकूट के ऋषियों ने अपने आश्रमों को सदा स्वच्छ और पवित्र रखा, उसी परंपरा में संघ के मंदिर स्वच्छता अभियान में बुंदेलखंड के गाँव-गाँव के मंदिरों में शास्त्रोक्त पूजा-पद्धति की पुनर्स्थापना और नियमित स्वच्छता का संकल्प लिया गया। जब मंदिर शुद्ध और सक्रिय होता है तो श्रद्धा जागती है और जब श्रद्धा जागती है तो सेवाभाव जागता है यही चित्रकूट का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संदेश है।
निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर महर्षियों की आयुर्वेद परंपरा की वापसी
चित्रकूट के वनों में महर्षि अत्रि और अन्य ऋषियों ने जो आयुर्वेदिक ज्ञान अर्जित किया था उसी परंपरा को संजीवित करते हुए TVDP के अंतर्गत गाँव-गाँव में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर आयोजित किए गए जिनमें आयुर्वेद, योग और प्राकृतिक चिकित्सा की जानकारी दी गई।
उपसंहार चित्रकूट का संदेश अमर है (Conclusion: The Eternal Message of Chitrakoot)
“रामं दशरथं विद्धि, मां विद्धि जनकात्मजाम्। अयोध्यामटवीं विद्धि, गच्छ तात यथासुखम्॥”
वाल्मीकि रामायण
अर्थात् मुझे दशरथ का राम समझो, सीता को जानकी समझो, यह वन ही अयोध्या है अर्थात् जहाँ धर्म है, जहाँ सत्य है, जहाँ प्रेम है वही स्वर्ग है। यही चित्रकूट का सबसे बड़ा सांस्कृतिक संदेश है।
चित्रकूट यह सिखाता है कि जीवन की सबसे कठिन परिस्थितियों में भी यदि व्यक्ति धर्म का मार्ग नहीं छोड़ता, परिवार के प्रति प्रेम नहीं छोड़ता और प्रकृति के साथ सद्भाव में जीता है तो वह राम बन जाता है। और जब हर गाँव का प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में थोड़ा-थोड़ा राम बनने का प्रयास करता है तब वह गाँव राम-राज्य बन जाता है।
सनातन सांस्कृतिक संघ और उसका TVDP कार्यक्रम इसी राम-राज्य की स्थापना का आधुनिक प्रयास है जहाँ आशामा के तीन आयाम मिलकर हर गाँव में वह आदर्श जीवन बनाते हैं जिसकी कल्पना स्वयं श्रीराम ने चित्रकूट की पर्णकुटी में बैठकर की थी।
श्रीमती हरिप्रिया भार्गव जी के नेतृत्व में जलाया गया आशामा का वह दीप वही दीप है जो चित्रकूट के रामघाट पर हजारों वर्षों से जल रहा है। वह बुझा नहीं है, वह बुझेगा नहीं क्योंकि जब तक एक भी श्रद्धालु का हृदय धड़क रहा है, यह दीप जलता रहेगा।
जय श्रीराम जय चित्रकूट जय सनातन
गाँव बदलेगा तभी देश बदलेगा






